आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव में आखिरी दम आज तक, क्या हैं चुनाव से जुड़ी 10 बड़ी बातें

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लखनऊ. आजमगढ़ से अखिलेश यादव और रामपुर से आजम खान 2019 के लोकसभा चुनाव में सांसद चुने गए थे. इसके बावजूद दोनों नेताओं ने 2022 का यूपी विधानसभा चुनाव लड़ा और जीते. अखिलेश यादव मैनपुरी जिले की करहल सीट से और आजम खान रामपुर से विधायक चुने गए. ऐसे में उन्हें अपनी सांसदी छोड़नी पड़ी. इस कारण खाली हुई दोनों सीटों पर लोकसभा के उपचुनाव होने जा रहे हैं. 23 जून को मतदान होगा और 26 जून को मतगणना. आज 21 जून को चुनाव प्रचार शाम 5 बजे खत्म हो जाएगा.
वैसे तो उपचुनाव सत्ताधारी दल का चुनाव माना जाता रहा है लेकिन यूपी में पिछले दो बार से नतीजे उल्टे हो रहे हैं. एक बार फिर से वही समय दस्तक दे रहा है. तो क्या इस बार नतीजे बदलेंगे या फिर इतिहास दोहराया जायेगा. दोनों सीटों पर हो रहे उपचुनाव से जुड़ी 10 जानने लायक बातें कौन कौन सी हैं, आइए आपको बताते हैं.

1. इस उपचुनाव में सबसे बड़ी चर्चा ये चल पड़ी है कि आखिर अखिलेश यादव ने चुनाव प्रचार से अपने आप को दूर क्यों रखा?

कहीं ये उनका अतिआत्मविश्वास तो नहीं हैं. दोनों सीटों पर सीएम योगी आदित्यनाथ ने एक-एक दिन रैलियां कीं. इसके साथ सरकार के दर्जनों मंत्रियों ने भी डेरा डाले रखा. सपा के दूसरे कद्दावर नेताओं ने भी जमकर प्रचार किया लेकिन, अखिलेश यादव तो अपनी सीट आजमगढ़ में भी प्रचार करने नहीं गए. यहां से उनके चचेरे भाई धर्मेन्द्र यादव चुनाव लड़ रहे हैं.

2. क्या होंगे उपचुनाव के नतीजे ?

इस सवाल का जवाब तो 26 जून को मिल पाएगा लेकिन, दोनों सीटें लंबे समय से सपा के पास रहीं है. आजमगढ़ सीट से पहले मुलायम सिंह यादव सांसद थे तो अभी अखिलेश यादव चुने गए थे. इसी तरह रामपुर सीट पर भी आजम खान का कब्जा 2019 में हो गया था. आजम खान के इस तिलिस्म को तोड़ने के लिए भाजपा ने पूरी ताकत झोंक रखी है.

3. सत्ता में रहने के बावजूद संसदीय सीटों पर उपचुनाव भाजपा के लिए रहे हैं दुखदायी.

इससे पहले यूपी में दो संसदीय सीटों पर उपचुनाव हुए थे. 2018 में प्रयागराज के फूलपुर और गोरखपुर सीटों पर उपचुनाव हुए थे. केशव मौर्या और योगी आदित्यनाथ के सीट छोड़ने से उपचुनाव हुए थे. राज्य और केन्द्र में भाजपा के सत्ता में रहने के बावजूद पार्टी दोनों सीटों पर हार गई थी. दोनों सीटों को सपा ने भाजपा से छीन लिया था. तब सपा और बसपा ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था.

4. दोनों सीटों पर भाजपा के लिए क्या हैं उम्मीदें ?

आम तौर पर ये धारणा है कि आजमगढ़ और रामपुर हमेशा से सपा का गढ़ रहे हैं लेकिन, ये पूरा सच नहीं है. दोनों सीटें भाजपा पहले जीत चुकी है. 2014 में डॉ नैपाल सिंह रामपुर से भाजपा के सांसद चुने गए थे. इसी तरह आजमगढ़ सीट पर 2009 में भाजपा का कब्जा रहा था. रमाकांत यादव ने जीत दर्ज की थी. ये अलग बात है कि वे अब सपा में हैं.

5. इस बार के चुनाव में पिछले चुनाव के मुकाबले बदले-बदले से हैं राजनीतिक समीकरण.

दोनों सीटों पर हो रहे उपचुनाव से जुड़ा हुआ ये बड़ा पहलू है . 2019 के मुकाबले इस उपचुनाव में पुराने सियासी समीकरण ध्वस्त हो गए हैं. 2019 के चुनाव में सपा और बसपा ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. इस बार दोनों अलग अलग हैं. वैसे बसपा ने रामपुर सीट पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारा है. लेकिन रामपुर सीट पर एक अनोखी सियासत ये देखी गई है कि यहां पर कांग्रेस नेता नावेद मियां ने भाजपा को समर्थन दे दिया है. नावेद मियां विधानसभा 2022 का चुनाव आजम खान से हार गए थे.

6. आजमगढ़ में त्रिकोणीय तो रामपुर में आमने – सामने की टक्कर.

2019 के चुनाव में दोनों सीटों पर सपा और भाजपा में आमने-सामने का मुकाबला हुआ था. तब सपा और बसपा ने साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ा था लेकिन, इस बार हालात जुदा हैं. आजमगढ़ में बसपा के उम्मीद्वार गुड्डू जमाली ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है. यहां भाजपा के दिनेश लाल निरहुआ, सपा के धर्मेन्द्र यादव उम्मीद्वार हैं. रामपुर में भी इस बार आजम परिवार से कोई चुनाव मैदान में नहीं है लेकिन, उनके खास आसिम रजा को आजम खान ने लड़ाया है.

7. दोनों सीटों की भाजपा अभी तक नहीं बना सकी है अपनी पकड़.

इसी साल मार्च में हुए विधानसभा के चुनाव में भले ही भाजपा को पूरे प्रदेश में प्रचंड जीत मिली हो लेकिन आजमगढ़ और रामपुर में उसकी हालत खस्ता ही दिखी थी. आजमगढ़ में तो भाजपा का खाता भी नहीं खुला और सभी 10 की 10 सीटें सपा ने जीत लीं. रामपुर में भाजपा के लिए थोड़ी तसल्ली की बात ये रही कि यहां की पांच विधानसभा की सीटों में से उसे दो, विलासपुर और मिलक मिल गईं. हालांकि मार्जिन इतना कम रहा कि भाजपा हारते-हारते बची.

8. आजमगढ़ में तो भाजपा का पुराना दांव लेकिन रामपुर में नया खेल.

भाजपा ने आजमगढ़ में अपना उम्मीद्वार नहीं बदला है. जिस तरह 2019 का चुनाव लड़ा था वैसे ही इस बार का उपचुनाव भी लड़ रहे हैं लेकिन, रामपुर के लिए भाजपा ने तगड़ी पत्ती बिछायी है. यहां से आजम खान के करीबी के खिलाफ एक दूसरे करीबी को ही पार्टी ने खड़ा किया है. यानी लोहे को लोहे से काटने की तरकीब लगाई गई है. रामपुर से भाजपा के उम्मीद्वार घनश्याम लोधी कभी आजम खान के करीबी थे. हाल ही में उन्होंने भाजपा को जॉइन किया था.

9. त्रिकोणीय मुकाबले में आजमगढ़ में सपा की कमजोर होती रही है स्थिति.

ये बड़ा दिलचस्प पहलू है कि जब-जब आजमगढ़ में त्रिकोणीय मुकाबला होता है तब-तब सपा की हालत कमजोर हो जाया करती है. चुनावी नतीजे इसके गवाह हैं. 2019 में जब सपा-बसपा ने मिलकर चुनाव लड़ा तो अखिलेश यादव 2 लाख 60 हजार से जीते लेकिन, 2014 के चुनाव में मुलायम सिंह यादव महज 63 हजार से ही जीत सके. पुराना रिकॉर्ड ऐसा ही रहा है. इस बार भी यहां त्रिकोणीय मुकालबा है. इसीलिए सपा ने भी पूरी ताकत धर्मेन्द्र यादव के लिए झोंक रखी है.

10. सपा के एम-वाई फैक्टर की अग्निपरीक्षा.

पिछले कुछ समय से अखिलेश यादव पर मुस्लिम समुदाय की अनदेखी के आरोप लगते रहे हैं. विधानसभा के चुनावों के बाद तो मुस्लिम नेताओं के सपा छोड़ने की बाढ़ सी आ गई थी. अब कम से कम आजमगढ़ में तो इसका लिटमस टेस्ट हो जाएगा. मुस्लिम-यादव फैक्टर के कारण ही सपा इस सीट पर अजेय दिखती रही है लेकिन, बसपा ने एक मुस्सिम उम्मीद्वार को ही उतारकर खेल को दिलचस्प बना दिया है. कहा जा रहा है कि यदि बसपा के उम्मीद्वार गुड्डू जमाली ने मुस्लिम समुदाय में सेंधमारी कर ली और दलित वर्ग का वोट उन्हें पूरा मिल गया तो सपा के लिए सीट बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो जायेगी. गुड्डू जमाली के पक्ष में दो तरह की हवा भी बनायी जा रही है. पहला तो ये कि जमाली एकलौते स्थानीय उम्मीद्वार हैं और दूसरा ये कि क्या संसद में यूपी से एक मुस्लिम सांसद नहीं पहंचेगा. देखना होगा इसका क्या एक्शन और रिएक्शन होता है.

Tags: Loksabha Elections, Samajwadi party



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