इंसानों की नासमझी से धधक रहे उत्तराखंड के वन, ज्यादातर मैन मेड होती है जंगल की आग

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जंगल में लगी आग से न सिर्फ पर्यावरण को गंभीर नुकसान होता है बल्कि वन संपदा की भी क्षति होती है

जंगलों में धधक रही आग (Forest Fire) का इंसानी हरकत से सीधा ताल्लुक है. आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि लॉकडाउन (Lockdown) के दौरान जब लोग घरों में रहने को मजबूर थे तो आग लगने की घटनाओं में काफी कमी आई थी. पर्यावरण मामलों के जानकार मनू डफाली का कहना है कि पूरी दुनिया में जंगलों में आग लगने की जो भी घटनाएं होती हैं, उनमें 80 फीसदी मैन मेड हैं

पिथौरागढ़. उत्तराखंड के जंगल इन दिनों आग (Forest Fire) से धधक रहे हैं. आपको यह जानकर हैरानी होगी कि 80 प्रतिशत से ज्यादा आग लगने की घटनाएं मैन मेड (Man Made) हैं. पिछले वर्ष लॉकडाउन (Lockdown) लगाए जाने से आग की घटनाओं में रिकॉर्ड कमी आई थी लेकिन इस बार हालात फिर बेकाबू हो गए हैं. जंगलों में धधक रही आग का इंसानी हरकत से सीधा ताल्लुक है. आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि लॉकडाउन के दौरान जब लोग घरों में रहने को मजबूर थे तो आग लगने की घटनाओं में काफी कमी आई थी. वर्ष 2020 में जंगलों में आग (Jungle Fire) लगने की घटनाएं बीते एक दशक में सबसे कम रही. लेकिन इस साल हालात बिलकुल अलग हैं. कुमाऊं हो या फिर गढ़वाल हर तरफ आग का तांडव देखने को मिल रहा है. डीएफओ पिथौरागढ़ विनय भार्गव ने बताया कि पिछले साल लॉकडाउन के कारण आग लगने की घटनाओं में भारी कमी देखी गई थी. जिससे साबित होता है कि ज्यादातर मामलों में इंसान ही जंगलों में आग लगने की वजह बनता है. वर्ष 2018 में पिथौरागढ़ में 95 आग लगने की घटनाएं हुई थीं जिसमें 197 हेक्टेयर जंगल जल कर खाक हो गया था. वहीं, 2019 में 135 घटनाओं में 293 हेक्टेयर जंगल भस्म हुआ था. लेकिन 2020 में लॉकडाउन के दौरान आग लगने की सिर्फ 26 घटनाएं हुई और 28 हेक्टेयर जंगल जला. जबकि इस साल अब तक 58 घटनाएं घट चुकी हैं और 60 हेक्टेयर जंगल जल चुका है. यह आंकड़े भले ही सिर्फ पिथौरागढ़ के हों, लेकिन इससे साबित होता है कि आग लगने की घटनाएं इंसानी हरकतों से सीधे जुड़ी हैं. जानकार मानते हैं कि दावाग्नि की 80 फीसदी घटनाएं मैन मेड हैं. पर्यावरण मामलों के जानकार मनू डफाली का कहना है कि पूरी दुनिया में जंगलों में आग लगने की जो भी घटनाएं होती हैं, उनमें 80 फीसदी मैन मेड है. जंगलों में धधक रही आग को रोकने के लिए सरकारी प्रयास जरूरी हैं लेकिन इससे भी जरूरी जागरूकता का होना है. यही नहीं इससे जुड़े कानूनी पहलू को भी मजबूत बनाने की खासी जरूरत है. मौजूदा कानूनों के मुताबिक आग लगाने के आरोपी को सिर्फ दो साल की सजा का प्रावधान है. यही नहीं घास के लालच में ग्रामीण भी जंगलों में आग लगाते हैं जो देखते ही देखते इस कदर फैल जाती है कि फिर उस पर काबू पाना आसान नहीं होता.



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