काफी दिलचस्प है ट्रैंपोलीन जिमनास्टिक, एथलीट हवा में उड़ते हुए दिखाते हैं मजेदार स्टंट

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ट्रैंपोलीम जिमनास्टिक.

ट्रैंपोलीन जिमनास्टिक (Trampoline Gymnastics) को ओलिंपिक (Olympic) के सबसे दिलचस्प खेलों में शुमार किया जाता है. भारत (India) ने फिलहाल इस खेल में कोई बड़ी उपलब्धी हासिल नहीं की है लेकिन कई युवा इस खेल से जुड़ रहे हैं

  • News18Hindi

  • Last Updated:
    September 8, 2020, 1:22 PM IST

नई दिल्ली. ओलिंपिक खेलों में जिमनास्टिक्स (Gymnastics) तीन प्रकार में बांटा गया है आर्टिस्टिक (कलात्मक) , रिदमिक (लयबद्ध) और तीसरा ट्रैंपोलीन (Trampoline). ट्रैंपलीन जिमनास्टिक्स को इन तीनों में सबसे ज्यादा दिलचस्प माना जाता है. 1964 में इसे पूर्ण खेल के तौर अपनाया गया. ओलिंपिक में ट्रैंपोलीन की एंट्री 2000 में सिडनी (Sydney) में हुई थी. इससे पहले केवल रिदमिक और आर्टिस्टिक जिमनास्टिक ही ओलिंपिक में शामिल थे. इस खेल की शुरुआत कहां से और कैसे हुई, ओलिंपिक में कौन से देशों का है इस खेल में दबदबा और क्या हैं इसके नियम. आज हम आपको इस खेल के बारे में सबकुछ बताएंगे. कहां से हुई ट्रैंपोलीन जिमनास्टिक की शुरुआत 1934 में जॉर्ज निसन (George Nissen) नाम के एक अमेरिकी जिमनास्ट ने सर्कस के एक्रोबेट्स से प्रेरित होकर रीबाउंड का प्रयोग कर एक्रोबैटिक कौशल का प्रदर्शन किया था. उन्होंने पहले मूल ट्रैम्पोलिन का निर्माण करने के लिए कैनवास और ट्यूब के अंदर का रबर प्रयोग में लिया था. Nissen ने स्पेनिश शब्द स्प्रींगबोर्ड से अपने प्रयोग का नाम ट्रैम्पोलिन रखा. धीरे-धीरे यह ओर विकसित हुआ और मौजूदा समय में यह सिंथेटिक के कपड़े से बनाया जाता है. शुरूआत में ये अंतरिक्ष यात्रियों, पायलटों और अन्य खेलों के लिए एक प्रशिक्षण उपकरण के रूप में उपयोग किया जाता था, ट्रैम्पोलिन की लोकप्रियता काफी ज्यादा हद तक बढ़ गई. ट्रैंपोलीन के नियम और कैसे दिए जाते है अंकट्रैंपोलीन में खिलाड़ियों को तीन आधार पर अंक दिए जाते हैं. सबसे पहले उनके रूटीन की मुश्किल स्तर को नापा जाता है फिर देखा जाता है कि एथलीट उस रूटीन कितनी अच्छी तरह पूरा करता है. इसके अलावा यह भी देखा जाता है कि खिलाड़ी कितना समय हवा में रहता है साथ ही उसका हॉरिजेंटल डिस्पलेसमेंट भी अंको का आधार होता है. खिलाड़ी क्वालिफाइंग राउंड में दो तरह के वॉलेंटरी रूटीन का प्रदर्शन करते हैं जिसमें 10 अलग-अलग स्किल दिखाते हैं. वहीं फाइनल में वह अलग रूटीम प्रस्तुत करते हैं. रूटीन में खिलाड़ियों को तीन तरह की पॉजीशन लेनी होती है. द टक, द पाइक और द स्ट्रेट यह तीन तह की पॉजीशन होती हैं. जहां द टक में खिलाड़ी दोनों घुटनों को मोड़कर छाती से लगा लेता है वहीं द पाइक में उसे दोनों पैर सामने की ओर सीधा करना होता है. द स्ट्रेट में खिलाड़ी को बिना कुछ किए सीधा जंप करना होता है. खिलाड़ी मुश्किल का स्तर बढ़ाने के लिए इन पॉजीशन को हासिल करने के बीच में रोटेशन और ट्विस्ट डालते हैं. इन सब के बीच खिलाड़ियों को अपनी लैंडिंग को लेकर भी ध्यान रखना होता है. एथलीट को ट्रैंपोलीन पर बने रेड क्रॉस पर ही लैंड करना होता है.ट्रैम्पोलिन बेड के नीचे एक मशीन को स्थापित किया जाता है, जो बीच की अवधी को रिकॉर्ड करती है. इससे एथलीट देर तक हवा में रहकर स्कोर बना सकते हैं. ओलिंपिक में कैसा रहा है सफर
1964 में लंदन में पहली बार विश्व चैंपियनशिप आयोजित की गई. इस प्रारुप को सिडनी 2000 में ओलिंपिक कार्यक्रम में जोड़ा गया था और इसमें पुरुषों और महिलाओं की व्यक्तिगत प्रतियोगिताएं शामिल थीं. ओलिंपिक टेस्ट इवेंट से पहले वर्ष में वर्ल्ड चैंपियनशिप में खिलाड़ियों के प्रदर्शन के आधार पर उन्हें ओलिंपिक के लिए क्वालिफिकेशन दिया जाता है. ओलिंपिक के ट्रैंपोलीन में 16 पुरुष और 16 महिलाएं हिस्सा लेती हैं. पहले दो ओलंपिक चैंपियन रूसी एथलीट थे, एलेक्सजेंडर और इरिना कारावैवा जिन्होंने सिडनी 2000 में क्रमशः पुरुष और महिला स्वर्ण पदक जीते.



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