कॉर्बेट में बाघ तो राजाजी में हाथियों की संख्या हुई क्षमता से अधिक

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फाइल फोटो

पार्कों में क्षमता से अधिक वाइल्ड लाइफ एक तरह से असंतुलन की स्थिति पैदा करेगा. वाइल्ड लाइफ को यदि पर्याप्त बेस नहीं मिलेगा तो इससे जंगल के अंदर मुश्किलें बढेंगी.

देहरादून. 71 फीसदी फॉरेस्ट कवर्ड एरिया वाले उत्तराखंड के प्रसिद्व दो पार्कों, कार्बेट टाइगर रिजर्व (Corbett Tiger Reserve) और राजाजी नेशनल पार्क (Rajaji National Park) जिसे अब राजाजी टाइगर रिजर्व भी कहा जाता है, में बाघ और हाथियों की संख्या क्षमता से अधिक हो गई है. भारतीय वन्य जीव संस्थान, डब्लूआईआई (WII) की एक रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है. डब्लूआईआई के वैज्ञानिकों को उत्तराखंड फॉरेस्ट डिपार्टमेंट द्वारा जून में एक प्रोजेक्ट सौंपकर इन दोनों पार्कों की बाघ और हाथियों की कैंरिग क्षमता पता करने को कहा था. डब्लूआईआई ने इस रिपोर्ट का कुछ पार्ट फॉरेस्ट डिपार्टमेंट को सौंप दिया है.

रिपोर्ट बताती है कि कार्बेट टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या उसकी क्षमता से अधिक हो गई है. रिपोर्ट के अनुसार सौ वर्ग प्रति किलोमीटर में अधिकतम 18 से 19 बाघ रह सकते हैं. इस लिहाजा से कार्बेट के कुल 1293 वर्ग किमी एरिया में 232 टाइगर ही आराम से रह सकते हैं, लेकिन कार्बेट में बाघों का कुनबा बढ़कर 252 पहुंच गया है. भविष्य में भी इसमें लगातार वृद्वि होने की संभावना है.

इसी तरह राजाजी टाइगर रिजर्व के कुल 820 वर्ग किलोमीटर में 225 हाथियों के रहने खाने के लिए पर्याप्त जगह है, लेकिन यहां भी हाथियों का कुनबा बढ़कर कहीं अधिक 311 हो गया है. हालांकि राजाजी टाइगर रिजर्व में टाइगर की संख्या अभी एरिया के अनुपात में सीमित है. राजाजी टाइगर रिजर्व की टाइगर कैरिंग क्षमता 83 है. इसके विपरीत यहां अभी 37 ही बाघ मौजूद हैं. कार्बेट टाइगर रिजर्व में हाथियों की कैरिंग क्षमता का डब्लूआईआई अभी अध्ययन कर रहा है. कार्बेट में मौजूदा समय में करीब 1223 हाथी हैं.पार्कों में क्षमता से अधिक वाइल्ड लाइफ एक तरह से असंतुलन की स्थिति पैदा करेगा. वाइल्ड लाइफ को यदि पर्याप्त बेस नहीं मिलेगा तो इससे जंगल के अंदर मुश्किलें बढेंगी. जानवर रिजर्व एरिया से बाहर आने को मजबूर हो जाएंगे और जंगल से बाहर आने की दशा में पोचिंग से लेकर मैन-एनिमल टकराव बढ़ेगा.

उत्तराखंड जैसे वन बाहुल्य राज्य मैन-एनिमल कन्फिलक्ट के मामले में देश के अव्वल राज्यों में से एक है. यहां पिछले बीस सालों में हाथी, भालू, टाइगर, लेपर्ड के हमलों में सात सौ से अधिक लोग मारे जा चुके हैं. इसके अलावा अन्य जंगली जानवरों के हमलों में मारे जाने वालों की भी बढ़ी तादाद है. घायलों की संख्या सैकड़ों में पहुंच जाती है.

उत्तराखंड में सबसे अधिक परेशान लोग लेपर्ड के हमलों से हैं, लेकिन उत्तराखंड में लेपर्ड की ही आज तक काऊंटिंग नहीं की गई. उत्तराखंड फॉरेस्ट डिपार्टमेंट को नहीं पता कि राज्य में लेपर्ड की संख्या कितनी हो सकती है. ठीक इसी तरह भालूओं का मामला भी है. भालूओं के हमले में दर्जनों लोग अपनी जान गवां चुके हैं. इसी साल अगस्त तक के फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के आंकड़े बताते हैं कि भालू के हमले में दो लोगों की मौत हो चुकी है, तो पचास से अधिक लोग घायल हो गए, लेकिन उत्तराखंड में भालूओं की संख्या का भी आज तक पता नहीं है. ना ही डिपार्टमेंट के पास भालूओं के लिए कोई पॉलिसी है.

साउथ अफ्रीका समेत कई देशों में एनिमल कंजर्वेशन के लिए पॉलिसियां बनाई गई हैं. इसके अनुसार यदि किसी एरिया में एनिमल उसकी कैरिंग केप्सिटी से अधिक हो जाते हैं तो उसकी हंटिंग के लिए परमिट जारी करने की व्यवस्था है. इससे वहां वाइल्ड लाइफ टूरिज्म को भी बढ़ावा मिलता है.


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