क्यों फीकी पड़ने लगी मिथिलांचल में वर-वधू चुनने की 700 साल पुरानी सौराठ सभा की चमक? saurath sabha a method of negotiation for bride and groom is about to end in mithilanchal area of bihar bramk | – News in Hindi

0
25


Saurath Sabha: मधुबनी जिले की प्रभारी मंत्री लेसी सिंह ने पिछले दिनों जिले की यात्रा के दौरान कहा था कि मैथिल ब्राह्मणों के विश्व प्रसिद्ध वैवाहिक निर्धारण स्थल सौराठ सभा के विकास की पहल की जाएगी. इसे पर्यटन स्थल का दर्जा दिलाने और राजकीय महोत्सव के रुप में मनाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा.

Source: News18Hindi
Last updated on: July 19, 2021, 9:46 AM IST

शेयर करें:
Facebook
Twitter
Linked IN

रजनीश चंद्र

पटना. कभी मिथिलांचल में विवाह तय करने की मशहूर स्थली रही सौराठ सभा की चमक आज फीकी पड़ गई है. सौराठ सभा का गरिमामय इतिहास रहा है जो सदियों से सामाजिक रिश्ते की बुनियाद को मजबूती प्रदान करता आया है. लेकिन आधुनिक युग में सामाजिक ताने-बाने के बदलते स्वरूप ने इसकी उपयोगिता पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है. फिर भी समय के अनुरूप ढलने की कोशिश के तहत अपनी परंपरा, संस्कृति को बचाए रखने की जिद ने उम्मीद की लौ जलाए रखी है. यह विश्वास है कि डिजिटल हो रही दुनिया के इस दौर में सामंजस्य बैठाते हुए सौराठ सभा की प्रासंगिकता बनी रहेगी. आइए , यह समझने की कोशिश करते हैं कि सौराठ सभा है क्या और क्यों इसके अस्तित्व पर सवाल खड़े हो रहे हैं?

सौराष्ट्र से आकर दो ब्राह्मण बसे थे यहां

सौराठ सभा करीब सात सौ वर्षों से मिथिलांचल में वैवाहिक जीवन की शुरुआत करने का जरिया रहा है. सौराठ बिहार के मधुबनी जिले का एक गांव है, जो जिला मुख्यालय से तकरीबन छह किलोमीटर की दूरी पर उत्तर पूर्व दिशा में स्थित है. कहा जाता है कि बारहवीं सदी में गुजरात के सौराष्ट्र से दो ब्राह्मण यहां आकर बस गये थे. वे मुगलों के आक्रमण के दौरान यहां आए थे. वे लोग सौराष्ट्र से आकर यहां बसे थे इसलिए बाद में इस जगह का नाम सौराठ पड़ गया. एक रोचक तथ्य यह भी है कि गांव से थोड़ी ही दूरी पर गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर की आकृति का एक मंदिर भी है. इसी सौराठ में एक विशाल पेड़ है जिसके नीचे सालों से जेठ-आषाढ़ महीने के दिनों में ग्यारह दिनों तक सभा का आयोजन होता है. जिसमें विवाह योग्य लडक़े-लड़कियों के परिजन आपस में मिलते हैं और वैवाहिक रिश्ते की मंजूरी लेते हैं. इस साल भी 27 जून से 7 जुलाई तक सौराठ सभा का आयोजन हुआ.

सात सौ साल पुराना है सौराठ सभा का इतिहास

सौराठ सभा का इतिहास बहुत पुराना है. करीब सात सौ साल से सौराठ सभा का आयोजन होता आया है. जानकारों के अनुसार 1310 ई. में कर्णाट वंश के राजा हरिसिंह देव ने इसकी शुरुआत की थी.सभा के आयोजन के पीछे उनकी सोच थी कि वैवाहिक रिश्ते की पवित्रता कायम की जा सके, यानि एक ही गोत्र में विवाह न हो बल्कि विभिन्न गोत्र में विवाह हो. अर्थात वर-वधू के गोत्र अलग-अलग हों. विवाह की गरिमा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए राजा हरिसिंह देव ने 1327 ई. में पंजीकरण व्यवस्था की शुरुआत की. पंजीकार का दायित्व था कि वे क्षेत्र के लोगों के कुल-खानदान के बारे में जानकारी इकट्ठा कर उसे पंजीकृत करें यानि रजिस्टर में दर्ज करें. इससे यह पता चल जाता था कि अमुक परिवार किस जाति का है, इसका क्या कुल है, क्या गोत्र है . इससे वैवाहिक रिश्ते तय करने में सहूलियत होती थी. पंजीकार की स्वीकृति के बिना शादी अमान्य थी.

क्यों मशहूर है सौराठ सभा?सौराठ सभा के दौरान विवाह योग्य लडक़े-लडक़ी के परिजन यहां आपस में मिलते हैैं और वैवाहिक रिश्ते की तलाश करते हैं. जब एक बार दोनों पक्ष रिश्ता तय करने के लिए तैयार हो जाते हैं तब वे लोग पंजीकार की मदद लेते हैं. पंजीकार इस बात की ताकीद करते हैं कि दोनों पक्षों में सात पुश्तों तक कोई वैवाहिक रिश्ता तो नहीं था? जब यह साबित हो जाता है कि सात पुश्तों तक वैवाहिक रिश्ता नहीं रहा है तब विवाह की मंजूरी पंजीकार दे देता है. साथ ही जन्मपत्री और राशिफल के आधार पर लडक़े और लडक़ी की कुंडली भी मिलायी जाती है. कुंडली मिल जाने पर शादी तय कर दी जाती है. समय के बदलते दौर में भी लोग भले शादी तय करने सभा में न आते हों लेकिन सिद्धांत लिखवाने आते हैं. सिद्धांत लिखवाने का मतलब होता है वैवाहिक रिश्ता तय करने की जानकारी देना. ताड़ के पत्तों पर सिद्धांत लिखने का रिवाज यहां आज भी कायम है.

क्यों फीकी पड़ने लगी मिथिलांचल में वर-वधू चुनने की 700 साल पुरानी सौराठ सभा की चमक? saurath sabha a method of negotiation for bride and groom is about to end in mithilanchal area of bihar bramk | - News in Hindi

बिहार के मिथिलांचल में मशहूर सौराठ सभा का एक दृश्य

क्यों कम हुआ सौराठ सभा का आकर्षण?

पहले जहां सौराठ सभा के दौरान लाखों की संख्या में लोग पहुंचते थे वहीं अब हजार की संख्या में भी लोग नहीं आ रहे है. धीरे-धीरे लोगों में इसका आकर्षण कम होता जा रहा है. आंकड़ों के अनुसार 1971 में जहां डेढ़ लाख लोग आए थे वहीं 1991 में पचास हजार लोग आए. यहां आने वालों की संख्या घटती ही जा रही है. इसके कई कारण हैं. पहले आवागमन का साधन कम था तो सौराठ सभा जैसे आयोजन वैवाहिक रिश्ते की तलाश करने का माध्यम बनते थे लेकिन अब तो घंटों में देश क्या विदेश की दूरी नापी जा सकती है. वैवाहिक रिश्ते की तलाश का दायरा भी बहुत विस्तृत हो गया है. आधुनिक युग में शादी में जाति,मूल,गोत्र,धर्म आदि के बंधन ढीले होते जा रहे हैं. प्रेम विवाह,अंतरजातीय विवाह,अंतरधार्मिक विवाह को समाज और कानून मान्यता ही नहीं दे रहा है बल्कि बढ़ावा भी दे रहा है.अब तो लडक़े-लडक़ी आपस में मिलते हैं और खुद हमसफर चुन लेते हैं. माता-पिता भी बच्चों की खुशी के लिए उनके निर्णय को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं.

परंपरा को बचाए रखने की कवायद

डिजिटलाइजेशन के इस दौर में अपनी परंपरा, संस्कृति को बचाए रखने की कोशिश भी हो रही है. कई सामाजिक संगठन इसमें लगे हुए हैं. समय के साथ चलते हुए रिश्ते-नाते के खातों यानि पंजी को कंप्यूटरीकृत करने का प्रयास किया जा रहा है. इससे मिथिला के लोगों को वंशावली के बारे में ऑनलाइन जानकारी मिल सकेगी. कुल-खानदान के बारे में जानकारी जुटाने में सहूलियत होगी. सरकार के स्तर पर भी सौराठ सभा की गरिमा को बनाए रखने की कोशिश की जा रही है. मधुबनी जिले की प्रभारी मंत्री लेसी सिंह ने पिछले दिनों जिले की यात्रा के दौरान कहा था कि मैथिल ब्राह्मणों के विश्व प्रसिद्ध वैवाहिक निर्धारण स्थल सौराठ सभा के विकास की पहल की जाएगी. इसे पर्यटन स्थल का दर्जा दिलाने और राजकीय महोत्सव के रुप में मनाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा. मधुबनी से ही आने वाले राज्य के पीएचईडी मंत्री रामप्रीत पासवान ने भी पंजी के कम्प्यूटरीकरण को आवश्यक माना है. उन्होंने भी कहा है कि सौराठ सभा को राजकीय महोत्सव का दर्जा दिलाने के लिए हर संभव मदद की जाएगी, ताकि इस अनूठी विश्वस्तरीय परंपरा को बचाया जा सके. कई अन्य सामाजिक संगठन भी इस कार्य में रुचि ले रहे हैैं, ताकि मिथिला की इस पौराणिक धरोहर की रक्षा संभव हो सके.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)


<!–

–>

First published: July 19, 2021, 9:46 AM IST



Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here