‘गांवों में पानी नहीं हैं, इसलिए दर्जनों लड़के कुंवारे हैं’, चित्रकूट के गांवों से आई ये रिपोर्ट चौंकाती है

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चित्रकूट से अखिलेश सोनकर की रिपोर्ट

“गांव में पानी की बहुत समस्या है. गांव के बाहर से बैलगाड़ी से पानी लेकर आते हैं. हालात ये हैं कि अभी तक शादी नहीं हुई है. कोई शादी के लिए आता है तो पूछता है कि मैं गांव में ही रहूंगा या बाहर कहीं दूसरे शहर. जैसे ही बोलता हूं कि गांव में ही रहूंगा तो वे शादी की बात आगे नहीं बढ़ाते हैं.” ये कहना है शिवमंगल यादव का.

वहीं, छबिलाल प्रसाद कहते हैं, “हमारे बच्चों की शादी नहीं हो रही है. रिश्तेदार तक पानी की समस्या की वजह से हमारे घर नहीं आते हैं. लोग दूर-दूर से पानी लाने को मजबूर हैं. भैंस-गाय का दूध बेचकर हमारा घर चलता था. लेकिन अब जब खुद पीने के लिए पानी नहीं है तो जानवरों को क्या पिलाएंगे. ऐसे में जानवर भी नहीं रख रहे हैं. रिश्तेदार बेटों की शादी की बात करते हैं. लेकिन, फिर पानी की समस्या देखकर किसी को भेजते नहीं है. कोई आ भी जाता है तो वह बात आगे नहीं बढ़ाता है.”

लीलावती कहती हैं, “यहां बोरिंग नहीं है. नल नहीं है. टैंकर आता है तो उससे पानी लेने के लिए लोग लड़ मरते हैं. लाठी-डंडा चलने लगता है. हालत बहुत खराब है. उम्र बढ़ती जा रही है. लड़के की शादी हो जाती, बहूरिया आ जाती तो आराम हो जाता. लेकिन, जिसके घर में पानी नहीं है उसके घर में कोई अपनी लड़की देगा. शादी ही नहीं हो पा रही है लड़के की.”

ये कहानी है चित्रकूट के गोपीपुर गांव की. पानी की किल्लत ने लोगों की जिंदगी तो बेहाल की है, अब अगली पीढ़ी को भी संकट में खड़ा कर दिया है. लड़कों की शादी नहीं हो रही है. दूध-दही का व्यापार करने वाले लोग जानवर नहीं रख पाने की वजह से व्यापार बंद कर रहे हैं. ढेरों परेशानियां हैं. आजादी के 75 वर्ष बाद भी स्थिति जस की तस है.

बुंदेलखंड के चित्रकूट जिले की मानिकपुर तहसील के आने वाले दर्जनों गांव की स्थिति ऐसी ही है. गर्मी की शुरुआत होते ही स्थिति और बिगड़ जाती है. ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए तरसने लगते हैं. करोड़ों रुपये खर्च कर देने के बाद भी पाठा में यह समस्या पहले की तरह ही मुंह बाए खड़ी है. जैसे-जैसे गर्मी की तपन बढ़ती है यहां ज़्यादातर गांव के जलस्त्रोत सूख जाते हैं. महिलाएं मीलों पैदल चलकर मुश्किलों से भरी गगरी सिर पर रखकर लाती हैं. महिलाएं पानी को अपने पति (खसम) से भी ज़्यादा मूल्यवान समझती हैं. पेयजल का यह संकट एक बार फिर भयावह रूप धारण कर चुका है.

‘गगरी न फूटे, चाहे खसम मर जाए”
गर्मियों में वैसे तो कुएं, तालाब, हैंडपंप इत्यादि जो भी पेयजल स्त्रोत हैं सभी का जलस्तर नीचे चला जाता है और लोग बूंद-बूंद पानी के लिए मोहताज हो जाते हैं. लेकिन, अप्रैल खत्म होते ही मई-जून महीने की जैसे शुरुआत होती है वैसे-वैसे सभी जल स्रोत सूख जाते हैं. सूरज की इस तपन को सहकर पाठा की महिलाएं मीलों पैदल चलकर अपने सिर पर भारी वजन वाले बर्तन रख कर पानी लाती हैं. शायद इसीलिए पाठा में कहावत है, ‘एक टक सूप – सवा टक मटकी, आग लगे रुखमा ददरी, भौरा तेरा पानी ग़ज़ब करी जाए, गगरी न फूटे, चाहे खसम मर जाए.’ पानी यहां के निवासियों के लिए अमृत के समान होता है.

कोई अपनी बेटी ब्याहना नहीं चाहता
तहसील मानिकपुर के अंतर्गत आने वाले जमुनिहाई, गोपीपुर, खिचड़ी, बेलहा, एलाहा, उचाडीह गांव, अमचूर नेरुआ, बहिलपुरवा जैसे दर्जनों गांवों के हजारों ग्रामीणों को पेयजल संकट की त्रासदी ज़्यादा नजदीक से दिखाई पड़ती है. शायद इसीलिए कोई अपनी बेटियों की शादी इन गांव में नही करना चाहता है. यही कारण है कि गांव में दर्जनों लड़के शादी की आस में कुंवारे बैठे हैं. उन्हें उम्मीद है कि पानी की समस्या खत्म होगी और उनकी शादी होगी.

लोग गर्मियों में पहाड़ों और जंगलों के किनारे बने जोहड़ों से एनकेन प्रकारेण अशुद्ध जल लाकर पीने को मजबूर हैं. रात होते ही ग्रामीणों को सुबह पानी भरने जाने की चिंता सताने लगती है. वे देर रात उठकर अपनी बैलगाड़ी को सजाकर उसमें पानी भरने वाले बर्तन को लेकर निकल पड़ते हैं पानी की तलाश में.

दर्जनों कुंवारे लड़के बैठे हैं गांव में
गांव के बिजली लाल और शिवपाल कहते हैं, पानी के लिए गर्मी के महीनों में काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है. जान तक जोखिम में डालनी पड़ती है. जंगलों से होकर पानी लेने जाना पड़ता है. उनकी पूरी उम्र बीती जा रही है, लेकिन पानी की समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. मीलों दूर से सिर पर पानी का बर्तन रख कर लाने की वजह से उनके सिर में अब दर्द बना ही रहता है. यही वजह है गोपीपुर गांव में कोई अपनी बेटी की शादी नहीं करना चाहता है. जिनकी शादी हो भी गयी है तो वह लोग इस गांव में शादी करवाकर पछता रहे हैं. गांव में दर्जनों कुंवारे लड़के बैठे हैं जिनकी शादी नही हो रही है.

मई का महीना खत्म होने वाला है, लेकिन अभी तक प्रशासन ने पानी की किल्लत से निपटने के लिए कोई ठोस नीति तैयारी नहीं की है. न ही गांव में बिगड़े पड़े हैंडपंपों को दुरस्त कराया है. न ही कुआं-पोखरों की सफाई कराई गई है. इससे लोग दूषित पानी पीने के लिए मजबूर हैं.


मानिकपुर के उप जिलाधिकारी प्रमेश श्रीवास्तव का कहना है कि पानी की समस्या को देखते हुए 18 ग्राम पंचायतों को चिह्नित कर लिया गया है. एक वॉट्सऐप ग्रुप बनाकर उन समस्याओं को देखा जाता है. हर एक ग्राम पंचायत में एक नोडल अधिकारी की तैनाती की गई है. वॉट्सऐप ग्रुप में पानी की समस्या की शिकायत मिलते ही नोडल अधिकारी द्वारा उस समस्या का निस्तारण कराया जाता है. प्रत्येक ग्राम पंचायत में टैंकरों के माध्यम से ग्रामीणों तक पानी पहुंचाया जा रहा है. पानी की समस्या को पूरी तरह खत्म करने के लिए सरकार द्वारा ‘हर घर नल, हर घर जल’ परियोजना संचालित की गई है, जिसका धरातल पर निर्माण कार्य चल रहा है. जल्दी पूरा होते हुए ग्रामीणों को पानी की समस्या से निजात मिल जाएगी.

क्या कहते हैं जिलाधिकारी
जिलाधिकारी शुभ्रांत कुमार शुक्ला का कहना है कि गर्मी के महीनों में शहर से लेकर गांव तक पानी की समस्या की शिकायतें आती हैं. इससे निपटने के लिए पूरी तैयारी की गई है. टैंकरों के माध्यम से लोगों तक पानी पहुंचाया जा रहा है. सरकार ने पानी की समस्या को पूरी तरह खत्म करने के लिए ‘जल जीवन मिशन’ के तहत ‘हर घर नल, हर घर जल’ परियोजना संचालित की है. इसका 33% काम पूरा हो गया है. अगली गर्मी से इस योजना के तहत हर घर तक नल के माध्यम से पानी पहुंचना शुरू हो जाएगा.

Tags: News18 Hindi Originals, Water Crisis



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