छत्तीसगढ़ी विशेष – नेम धरम सबो बर बने हे तभे निभाव होवत हे

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समाज के नियम सब पर लागू होते हैं.

एदे कालेच के बात हरय अइसे केहे मा कतका सुघ्घर लागथे. बने मिले माझे संस्कार हावय. अपन जगा मा ठाढ़े रहिबे ते ठाढ़ेच रहि जाबे.

  • News18Hindi

  • Last Updated:
    November 23, 2020, 1:07 PM IST

जगत नियंता निरमान काल के लेके आज तक ले कोनो परकार के भेद भाव नई राखे हे. सबो जीव अपन-अपन जिनगी मा बने निभाव करत आवत हें तेकरे सेती दुनिया चलत आवत हे अउ चलही घलोक उत्ती, बुड़ती, रक्सहूं, भण्डार अउ अगास-पताल ए दसो दिसा मा जेकर चलथे तेने हरय नियंता. पुरो-पुरो के सबो डहर अपन मया ला बांटने वाला कभू सुतय नहीं तइसे लागथे. मन भितरी काय चलत हे तेला तें जानथंव काहत होबे ते काहत रा सबो पहली ले इहां बने बनाए धरे हावय. पीपर कस पाना डोलत जीव ला अपन जिनगी मा मति अनुसार बेवहार करना चाही. मोरेच मोर, तोरेच तोर कहइया सुनइया कतका झन होंही तोर अंगरी मा गिना जाहीं. अब गनती तोर हाथ मा हावय तफेर काबर उदा-बादी होवत हे, सोचे के बात हरय. रद्दा बना अउ बेरा-बेरा चतवारत रा. चतवार के राखे मा कांटा-खुटी के डर नइ राहय रात बिकाल के घलो अंधियारी मा अन्ताजी रेंगे जा सकत हे. सुख अउ दुख के एही हरय चिन्हारी. सुख हावय ते दुख घलो होविच अइसे जानले. पहली ले जानबा नइ होवय ऊदुक ले आथे अउ हमला अइसे लागथे के दुनिया भर के दुख हमरे बांटा मा परगे हे, अइसे नोहय येला अंधियारी, अंजोरी पाख बनाके बनाने वाला हमला चेताए धरे हे.

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चलना का होही अइसे कहिके कहूं कोनो सोचबेच करत होती तेला तें नइ जानस न में नइ जानव एमा हमरे गलती हावय.गनती के दिन हावय तभो ले गनती के सिरावत ले रइही अइसे सियान मन घलो कथें. कतका सुघ्घर सियानी के रद्दा हावय एला जानना जरूरी हे. सबो जगा के सियान मनखे अपन-अपन सेती बुता तियारे बरोबर नेम धरम ला सिखो के राखे के उदिम करत रइथें तेकरे सेती हमन जीयत-जागत हावन. जिनगी के सार अतकेच मा हावय के सबो जिनीस के उपजारने वाला अक्कल घलो बांटे हावय मनखे बनाए के पहिली अब्बड़ सोचिन होहीं तइसे घलो लागथे काबर के जगा के हिसाब ला घलो धरे बांधे राखना जरूरी हे.

जीव के जगत ला देख डारबे कहूं भुंइया मा, कहूं पानी मा त कहूं अगास मा निहार के देख सबो अपनेच मा नइ राहंय एक दूसर ले सेती बनाए राखथें सेती बनाएच के सेती हरय.पानी मेरन पानी आगी मेरन आगी.करुकसा घलो हे ते मीठ-मीठ ला सकेलत रइहंव कहिबे ते बात नइ बनय.सवाद लेवइया कतका अकन सेवाद ला गना डारही तेला सबो जान डारथें.पहली अउ अब मा कतको फरक परगे अइसे कहइया घलो मिलही.सबो झन बर काम बुता हावय.तियारी राखे रा,तियारी राखे रहिबे ते दुख पीरा जादा नइ जियानय. पारा परोसी, लरा-जरा, भाई भतीज एमन दुख पीरा मा अगुवा के तोला धीरज धरे बर काबर कहिथे काबर के ए सब दुनिया मा होथेच आज सुख हे के दुख हे तोला समाजेच मा रहिके जनाही. जानना अउ जनवाना सबो धरम-करम मा बहुत जरूरी हावय.सबो धरम बने हे,बनाने वाला एके झन हावय चारों मुड़ा धियान धरे रथे, कोन,कोन डहर ले आही ओला पता हे.

एदे कालेच के बात हरय अइसे केहे मा कतका सुघ्घर लागथे. बने मिले माझे संस्कार हावय. अपन जगा मा ठाढ़े रहिबे ते ठाढ़ेच रहि जाबे. एकन्गू रेहे मा नइ बनय. सबके आदर होना चाही.सब जगा जाना चाही सबो ला समझना चाही, कतका झन कतको जगा मा हावंय फेर वो जगा काखर हरे एला जानना जरूरी हाबे थोरिच किन निहार के देखे मा जगा बनाने वाला के काम अउ नाम तोर मुंह ले निकलिच जाही हे ईश्वर ते दुनिया के बनाने वाला तोर लीला अपरम्पार हे.

एक जगा सबो धरम के मनखे सकलाके बिचार करत रिहिन अउ करतेच राहंय कतका जरूरी हावय है ना चलना अउ चलाना सब हमरे हांत-बात हे. थोरको खब डब होथे ततके मा कइसे अलकर लागे ला धर लेथे एला सबो झन अनभो करथें फेर रोसे रोस मा आंही ले कांही झन होवय एला हमेशा सुरता मा राखना जरूरी हे काबर के सबो जनम बर सबो जगा के अपन बिसवास रही तभे संसारी सुखी सुमरन करत अपन जिनगी मा निस्तार करत रिहीं काबर के आना जाना घलो लागे रइथे.


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