जंतर-मंतर के विरोध-प्रदर्शन स्थल बनने की कहानी 28 साल पुरानी

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किसानों का जंतर मंतर पर कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध शुरू हो चुका है. किसान वहां पहुंच रहे हैं. वहां से वो अब रोज सरकार के खिलाफ अपनी नाराजगी का इजहार करेंगे. पिछले कुछ सालों में जंतर मंतर देश का सबसे विरोध प्रदर्शन स्थल बनकर उभरा है. वहां पर हमेशा तरह तरह के विरोध प्रर्दशन और आंदोलन चलते रहते हैं. कुछ लोग तो वहां सालों से बैठकर अपनी मांगों को लेकर विरोध कर रहे हैं. जंतर मंतर कैसे देश का सबसे बड़ा धरना स्थल बन गया, इसकी कहानी रोचक है. वैसे पूरे देश से लोग यहां अपनी आवाज उठाने इसलिए भी पहुंचते हैं, क्योंकि ये संसद के बिल्कुल करीब है. उन्हें लगता है कि वो अगर यहां आकर कुछ कहेंगे तो उनकी बात सुनी जाएगी.

हालांकि जंतर मंतर इतना बड़ा भी नहीं है कि वहां भारी पैमाने पर भीड़ जुटाई जा सके लेकिन ये बात सही है कि यहां की स्थिति ऐसी है कि यहां भीड़ को नियंत्रित किया जा सकता है. 1993 में केंद्र सरकार के एक आदेश के बाद ही धरना और प्रदर्शन स्थल के तौर पर जंतर मंतर को चिन्हित किया गया.

पिछले कुछ सालों में जंतर मंतर कई बड़े विरोध और प्रदर्शन का गवाह रहा है. चाहे वो एनजीटी को लेकर प्रदर्शन हुआ हो या फिर वर्ष 2011 में अन्ना हजारे की अगुवाई लोकपाल विधेयक को लेकर हुआ आंदोलन. हालांकि कई बार यहां बड़े प्रदर्शनों की अनुमति नहीं भी मिली है लेकिन ये ऐसी जगह भी है, जहां बड़े पैमाने पर भीड़ भी प्रदर्शन करने जुटती है तो अकेले आदमी भी तख्ती लेकर धरने पर बैठ जाता है.

कई लोग तो यहां अपनी मांग के लिए कई साल धरने पर बैठे रहे. देशभर से लोग यहां आकर अपनी आवाज को संसद में बैठे जनप्रतिनिधियों और सरकार तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं.

हालांकि 30 अक्टूबर 2018 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिल्ली की इस जगह पर आकर विरोध करने पर पाबंदी लगा दी. एनजीटी को लगा कि यहां प्रदर्शन होते रहने से इस जगह की हरियाली और पर्यावरण पर असर पड़ सकता है. इस इलाके के लोगों का कहना था कि जंतर मंतर पर लोगों के प्रदर्शन से ध्वनि प्रदूषण के साथ गंदगी भी फैलती है. तब एनजीटी ने प्रशासन को आदेश दिया कि जंतर मंतर की जगह रामलीला मैदान पर प्रदर्शन किए जाने चाहिए, जो इस जगह से 04 किलोमीटर दूर है.

जंतर मंतर का निर्माण 18वीं सदी में जयपुर के महाराजा जयसिंह द्वितीय एक वेधशाला के तौर पर कराया था. (फोटो – शटरस्टॉक)

यहां तरह तरह प्रदर्शन यहां हो चुके हैं

दिल्ली के मास्टर प्लान में ये जगह रिहायशी इलाके के तौर पर दर्ज है. वैसे जंतर मंतर पर अजीबोगरीब मांगों के लिए भी प्रदर्शन हो चुके हैं. कुछ ऐसे लोगों ने भी यहां डेरा डाला है, जो मीडिया जगत में सुर्खियां बन गए. यहां से संसद भवन मुश्किल से 02 किलोमीटर दूर है.

पहले दिल्ली में लोग बोट क्लब पर आकर धरना देते थे

विरोध स्थल पर जंतर मंतर की कहानी 1993 में शुरू होती है. जंतर मंतर से पहले बोट क्लब पर धरना और प्रदर्शन हुआ करते थे.1988 में उत्तर प्रदेश में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत करीब 05 लाख किसानों और मवेशियों के साथ बोट क्लब पर आ जमे. राजधानी पैरालाइज हो गई. पहले किसान राजघाट पर आए थे. उसके बाद बोट क्लब पर चले आए. फिर वो अपनी बैलगाड़ियां इंडिया गेट और उसके चारों ओर से लान तक ले आए. उस समय दिल्ली में जिधर देखो उधर किसान और उनके मवेशी नजर आने लगे.

तब सरकार ने जंतर मंतर को धरना स्थल बनाया

उस समय राजीव गांधी की सरकार थी. जिसे किसानों की 35 सूत्रीय मांगों को मानना पड़ा. लेकिन उसके बाद की सरकारों को लेकर इस तरह के प्रदर्शन को नियंत्रित किया जाना चाहिए. तब जंतर मंतर को धरना स्थल के तौर पर तय किया गया. ये संसद के करीब भी था. ये भारी भीड़ भी इकट्ठी नहीं हो सकती थी. फिर इस स्थान की जो स्थिति है, उसमें यहां भीड़ को नियंत्रित कर पाना आसान है.

जंतर-मंतर के विरोध-प्रदर्शन स्थल बनने की कहानी 28 साल पुरानी

जंतर मंतर के धरना स्थल पर किसान विरोध प्रदर्शन के लिए पहुंचने शुरू हो गए हैं.

देशभर से लोग यहां आते रहे हैं

अब विरोध करने वाले और प्रदर्शनकारी जंतर मंतर पहुंचने लगे. लोग दूर दूर से यहां आने लगे. उन्हें लगता था कि अगर वो यहां आकर धरने पर बैठेंगे तो उनकी बात सुनी जाएगी, वो अपनी आवाज को लोगों तक पहुंचा सकेंगे. यहां कर्ज में डूबे किसान से लेकर बलात्कार की पीड़ित और वो सारे लोग आने लगे, जिन्हें न्याय नहीं मिल सका था.

लोकतंत्र से इस जगह का खास रिश्ता बन गया

कुल मिलाकर जंतर-मंतर एक ऐसी जगह बन गई, जिसका लोकतंत्र से खास और जटिल दोनों तरह का रिश्ता बन गया. यहां हुए कुछ प्रदर्शन इतने बड़े हो गए कि उनका राजनीतिक महत्ता देशभर में महसूस की गई.

अन्ना हजारे का आंदोलन यहीं से शुरू हुआ

05 अप्रैल 2011 जब महाराष्ट्र के करीब अनजाने से सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार खत्म करने और लोकपाल बिल लाने के जंतर मंतर पर अनशन शुरू किया तो इसकी गूंज पूरे देश में सूनी गई. प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल जैसे कार्यकर्ता उनसे जुड़ गए और इसी आंदोलन से फिर आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ.

anna hazare birthday

वर्ष 2011 में अन्ना हजारे ने जंतर मंतर से ही अपना आंदोलन शुरू किया था, जिसकी गूंज ना केवल पूरे देश में सुनी गई बल्कि उसका व्यापक असर भी हुआ.

मेधा पाटकर ने भी यहां किया आंदोलन

2013 में समाज सेवी मेधा पाटकर की अगुवाई में यहां नर्मदा बचाओ आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन हुआ. वहीं, साल 2017 में तमिलनाडु के किसानों ने जंतर मंतर पर जोरदार प्रदर्शन किया था. किसानों ने केंद्र सरकार से 40 हजार करोड़ रुपये का सूखा राहत पैकेज देने की मांग की थी. कुछ संगठन तो ऐसे हैं,जो पिछले दो-तीन साल से अपनी मांगों को लेकर यहां डेरा जमाए हुए हैं. उनके लिए यही घर है और यही कर्मभूमि.

पहले अकबर रोड पर भी होते थे प्रदर्शन

दिल्ली में पहले प्रदर्शन अकबर रोड पर होते थे, फिर बोट क्लब पर हुए और फिर वहां से जंतर-मंतर पर शिफ्ट कर दिए गए.वैसे जंतर मंतर 18वीं सदी में जयपुर के महाराजा जयसिंह द्वितीय द्वारा बनवाई गई एक खगोलीय वेधशाला है. जिसे 1724 में बनवाया गया था. दिल्ली का ये जंतर-मंतर समरकंद की वेधशाला से प्रेरित है.

जंतर-मंतर के विरोध-प्रदर्शन स्थल बनने की कहानी 28 साल पुरानी

ये मुंबई का आजाद मैदान है, जहां इस महानगर के सारे बड़े विरोध प्रदर्शन होते हैं. यहां अक्सर महाराष्ट्र के किसान आकर अपनी आवाज उठाते रहे हैं. (photo shutter stock)

दूसरे महानगरों के विरोध स्थल

मुंबई में आमतौर पर विरोध प्रदर्शन आजाद मैदान में होते हैं. हैदराबाद में इंदिरा पार्क में धरना चौक पर धरना देने के कार्यक्रम होते रहे हैं. चंडीगढ़ में वर्ष 2010 से रैली ग्राउंड पर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं. जालंधर में देश भगत यादगार हाल में ये होता है. लखनऊ में हजरतगंज के पास जीपीओ के सामने चौराहे पर धरना देने के लिए लोग बैठा करते हैं.

कोलकाता में बिनय बादल दिनेश बाग में धरना प्रदर्शन होते हैं. चेन्नई में चेपक स्टेडियम में विरोध करने वाले इकट्ठा होते हैं.

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