जब 133 क्रांतिकारियों को बरगद की शाखाओं पर दी गई थी फांसी, जानें कानपुर के उस बूढ़े बरगद की दास्तां

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रिपोर्ट: अखंड प्रताप सिंह

कानपुर: सुनो, मैं केवल जड़, तना और पत्तियों से युक्त वट वृक्ष ही नहीं, बल्कि गुलाम भारत से लेकर आज तक के इतिहास का साक्षी हूं. मैंने अनगिनत बसंत व पतझड़ देखे, 4 जून 1857 का वह दिन भी देखा, जब मेरठ में सुलगी आजादी की चिंगारी कानपुर में शोला बन गई थी. मैंने नाना साहब की अगुवाई में तात्या टोपे की वीरता देखी और अजीमुल्ला की शहादत देखी. देश की आजादी के दीवानों पर क्रूर एवं दमनपूर्ण कहर ढाए जाने से मेरी जड़ें हिल गईं. वह दिल दहला देने वाला दिन मैं आज भी नहीं भूल पाता, जब 133 देश भक्तों को अंग्रेजों ने मेरी शाखाओं पर फांसी के फंदे पर लटकाया था. उस दिन मैं बहुत चीखा, चिल्लाया, आंखों के आंसू रो-रोककर सूख गए .यह दर्द भरी दास्तान याद आते ही मैं कराह उठता हूं. नाना राव पार्क में लगे एक शिलापट्ट पर लिखे इस लेख को आप जब पढ़ेंगे तो आपके मन में जिज्ञासा जरूर उत्पन्न होगी कि आखिर एक पेड़ ने अपना दर्द क्यों बयां किया. आज हम आपको बताएंगे क्या है उस बूढ़े बरगद की दास्तां.

दरअसल, 1857 से 1947 तक स्वतंत्रता के लिए चल रही क्रांति में कानपुर का अहम योगदान रहा है. कानपुर में आज भी कई ऐसे स्थान हैं, जो स्वतंत्रता संग्राम के समय की याद दिलाते हैं. उन्हीं में से एक है कानपुर का बूढ़ा बरगद, जहां पर अब शहीद स्थल बना दिया गया है. लेकिन बूढ़े बरगद की कहानी आपके अंदर भी क्रांति की चिंगारी फूंक देगी कि किस प्रकार से अंग्रेजों ने हमारे देशभक्तों को यातनाएं दी थीं.

133 क्रांतिकारियों को बरगद की शाखाओं पर दी गई थी फांसी
इतिहासकार मनोज कपूर ने बताया कि 1857 में मेरठ में विद्रोह की आग कानपुर में ज्वाला बनकर भड़की थी. कानपुर के क्रांतिकारी देश को आजाद कराने का मन बना चुके थे. कानपुर में नाना राव ने अंग्रेजी हुकूमत की नीव उखाड़ दी थी. अंग्रेज कानपुर छोड़कर इलाहाबाद की तरफ चले गए थे. वहीं कानपुर में अंग्रेजों की हिंदुस्तानी बीबियों के लिए बीवी घर बना हुआ था. जब अंग्रेज यहां से चले गए तो उस बीवी घर में मौजूद लोगों को मार दिया गया था. उन को किसने मारा अभी तक इसके कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं. लेकिन फिर अंग्रेजी हुकूमत ने इसका बदला लेने के लिए क्रांतिकारियों पर जुल्म बरसाए थे. तभी 133 क्रांतिकारियों को नाना राव पार्क स्थित बरगद में फांसी पर लटका दिया गया था. तभी से यह बरगद बूढ़ा बरगद के नाम से जाने जाने लगा .

नहीं बचा है बूढ़ा बरगद
कानपुर के नाना राव पार्क स्थित बूढ़ा बरगद की रख-रखाव न होने से यह अब यहां पर नहीं बचा है, सिर्फ यहां पर एक शहीद स्थल बना दिया गया है, जिसकी ढंग से देखरेख भी नहीं की जाती है. कानपुर की क्रांति से इसका गहरा नाता होने के बावजूद इसके संरक्षण के लिए शहीद स्थल तो बना दिया गया लेकिन इसको उपेक्षित सा माना जाता है.

Tags: Kanpur news, Uttar pradesh news



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