जानिए झांसी की पानी वाली धर्मशाला की कहानी,जिसे देखने के लिए मंत्रियों का लग रहा है जमावड़ा 

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(रिपोर्ट – शाश्वत सिंह)

झांसी के पंचकुइया इलाके में स्थित पानी वाली धर्मशाला आज हर किसी के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है.स्थानीय लोगों के अलावा प्रदेश सरकार के मंत्री भी इसे देखने के लिए आ रहे हैं. इस आकर्षण का कारण है पानी वाली धर्मशाला का सौंदर्यीकरण.पानी वाली धर्मशाला का स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के अंतर्गत पुनरुद्धार किया गया है.इसमें सजावटी लाइटें और फव्वारे लगाए गए हैं.

पहले लगा रहता था गंदगी का अंबार

कुछ समय पहले तक पानी वाली धर्मशाला में गंदगी का अंबार लगा रहता था.यहां इतनी बदबू आती थी कि लोग इसके पास भी नहीं जाते थे.इस गंदगी क्या कारण था शहर के कई नालों का पानी.क्योंकि कई नालों का गंदे पानी को इसी बावड़ी में छोड़ दिया जाता था.स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के अंतर्गत अब इन नालों के पानी को कहीं और डाइवर्ट कर दिया गया है.

सुंदरीकरण का काम हुआ शुरू

इसके बाद पानी वाली धर्मशाला के आसपास सुंदरीकरण का काम शुरू किया गया.दीवारों पर सुंदर चित्र बनाए गए.बावड़ी के मध्य दो फव्वारे लगाए गए हैं.इसके साथ ही बावड़ी के चारों तरफ लाइटिंग भी की गई है.पर्यटकों के लिए बैठने के उचित इंतजाम भी किए गए हैं.इसके साथ ही एक पासे का भी निर्माण किया गया है ताकि लोग बावड़ी के चारों ओर घूम सकें.

पेशवा बाजीराव से जुड़ा है इतिहास

पानी वाली धर्मशाला का ऐतिहासिक महत्व भी है. 1729 में जब राजा छत्रसाल मुगलों से युद्ध हार गए थे तो उन्होंने उस समय के मराठा शासक पेशवा बाजीराव प्रथम को अपनी मदद के लिए बुलाया था.पेशवा बाजीराव 20 हजार सैनिकों के साथ यहां आए और उन्होंने राजा छत्रसाल को मुगलों से आजाद कराया.राजा छत्रसाल में पेशवा बाजीराव को धन्यवाद स्वरूप अपने राज्य का एक तिहाई हिस्सा तोहफे में दे दिया था.तब पेशवा बाजीराव ने अपने एक मंत्री को झांसी और उसके आसपास के इलाकों की देखरेख के लिए भेजा था. उस मंत्री ने सबसे पहले झांसी किले में रह रहे मुगलों को बाहर निकाला और उसके बाद किले का विस्तार भी कराया था.

यह है पानी वाली धर्मशाला नाम की कहानी

विस्तार के दौरान ही उस पेशवा की नजर इस बावड़ी पर पड़ी, जो कि झांसी में उस समय एकमात्र साफ पानी का स्त्रोत था.उन्होंने ने बावड़ी के आस-पास ही धर्मशालाओं का निर्माण करवा दिया ताकि बाहर से आने वाले लोगों को ठहरने की कोई समस्या ना हो.इसी कारण इस बावड़ी का नाम पानी वाली धर्मशाला पड़ गया.हालांकि अब धर्मशाला यहां पर नही है पर आज भी इस बावड़ी को उसी नाम से जाना जाता है.



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