नीम हकीम खतरा जान में कतना सचाई बा, पढ़ीं अउर जानी…

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नया साल-संवत के सिरीगनेस चइत के अलमस्त आ उतपाती महीना से. फगुआ के रंग-अबीर,धुरखेल आ भांग के निसा-लहर एक महीना ले बरकरार रहिके उतपात मचावत रहेला. तन-मन में मस्ती छवले रहेले, आंखि अन्हमुंदाइल रहेले आ आलस में डूबल देह कबो अंगइठी लेला,त कबो अनसोहाते कसमसात रहेला. अइसना में दुआर खाढ़ नीम के जुड़छांह अजबे शीतलता आ अनकहल सुख देत रहेला. दुआर प के नीम के गांछ एगो सवांग लेखा लागेला-

निमिया जे लागे करुआइन,
शीतल बतास बहे हो!

नीम के फेंड़ बेगर कवनो कोशिश के अपने आप फरत-फुलात रहेला. ना एकर केहू मेहनत-मशक्कत कऽके बीया बोवेला, ना पानी पटावे भा देखभाल में जीव-जांगर लगावेला. ना हर्रे लागे, ना फिटिकिरी आ रंग चोखा हो जाला. जइसे मनई में सर्वहारा होला हर तरह से दबाइल-कचराइल आम अदिमी,ओही तरी गांछिन में सर्वहारा होला नीम. एकर सुभाव त संत के होला-हरदम देबे आ लुटावे के दियानत.जब मन करे,एकरा पर चढ़ि बइठीं आ बेमोह-दया के डाढ़ि में से छरका तूरि लीं निछोहीं घावे, बाकिर ई अमनख ना मानी. असीसत कही-जाईं, हमरा दतुअन से मुंह धोके दांत साफ करीं, सेहतमंद रहीं!

नीम हकीम
लोग अनेरे कहेला कि नीम हकीम खतरा जान! बताईं भला, ई कवनो बात भइल?
जेकरा खातिर चोरी कइलीं, सेही कहे चोर-चोर! ई निमिया सर्वहरे भर ना ह,सांचो के हकीम ह. एकर टूसा-पतई चिनिया रोग रामबान इलाज ह. पतई-छाल के काढ़ा फोरा-फुंसरी, भकंदर से लेके कवना चर्मरोग में कामे ना आवे?एकरा निबौली के का कहे के! फर से निकलल बीया के नीम के तेल ना खाली कीटनाशक होला, बलुक ऊ कवनो घाव में कामे आवेला आ ओह तेल से बराइल दीया सउंसे वातावरन के कीटरोधी आउर प्रदूषणमुक्त बना देला. सोचीं, जदी ई घर के बैद ना रहित,त नीम के साबुन, तेल आउर मंजन-पेस्ट कइसे बनितन स? भलहीं एकर सवाद तींत,तीक्ख आ कड़ुआहट भरल होखे, बाकिर ई जहवां रहेले, उहवां के समूचा माहौल, पर्यावरण आ जनमानस के सेहतमंद बनवले राखेले. एकदम निष्काम करमयोगी लेखा. एही से नू गावल जाला कि भले ई करुआइन होखे,बाकिर शीतल बतास देले ई. अइसन हकीम ह ई ,जे खुद मए खतरा उठाके हमनीं के जिनिगी के निरोग आ जियतार बनावेला.

निमिया के डाढ़ आ माई के बसेरा
हमनीं के लोक में चाहे जतना देवी माई होखसु-काली माई, शीतला माता, कमइछा माई-सभकर स्थान निमिए के गांछ तर रहेला.इहवां के काली माई दुर्गा-काली वाली काली ना होली. नीम के जुड़छंहिया में इन्हिकर सात गो पिंडी रहेला आ ई सातों बहिना सउंसे समाज के लोकमंगल के कामना करेली. पूजा में धजा बदलाला आ दूध के कराह चढ़ावल जाला. गोइंठा के आगी प कराह में दूध,चाउर,गूर धऽके माई के गोहरावल जाला आ दूध फंफा के जब नीचे गिरे लागे,त ई माई के खुश होके असीसे के सूचक होला.हरेक भोजपुरिया इलाका में माई के एगो गीत गवाला,जवना में देवी माई के नीम के डाढ़ प झुलुहा झूले आ गीत गावे के जिकिर होला-

निमिया के डाढ़ मइया लावेली हिंड़ोलवा कि झूली-झूमी,
मइया गावेली गीत कि झूली-झूमी.
झूलत-झूलत मइया के लगली पियसिया कि चलि भइली,
मलहोरिया आवास मइया चलि भइली.

निमिया के डाढ़ प झुलुहा झूलत जब देवी माई के पियासि लागत बा, त ऊ कवनो राजा-महराजा भा सेठ-साहूकार किहां नइखी जात. ऊ जात बाड़ी सर्वहारा मलहोरी का घरे आ मालिन से निहोरा करत बाड़ी पानी पियावे के.

सूतल बाड़ू कि जागल ए मालिन, बून एक,
मोहिके पनिया पियावऽ कि बून एक!

बाकिर मालिन के कोरा में त लरिका बा, फेरु ऊ कइसे पानी पियावसु?माई लइका के खुद के सिरिजल सोनहुला खटोला प सुताके पानी पियावे के कहत बाड़ी-

कइसे के पनिया पियाईं ए सीतली मइया,
मोरा गोदे
दीहल बलका तोहार कि मोरा गोदे.
बलका सुतावऽ मालिन,सोने के खटोलवा कि बून एक
मोहिके पनिया पियावऽ कि बून एक!

आखिरकार मालिन ओइसहीं पानी पियावत बाड़ी आ देवी माई तृप्त होके उन्हुका के असीसत कहत बाड़ी-

जइसन मालिन मोहें जुड़ववलू कि ओइसन
तोहार धियवा जुड़ासु मालिन ओइसन
तोहार पतोहिया जुड़ासु मालिन ओइसन!

बाकिर बेटी त ससुरा बाड़ी आ पतोहि नइहर गइल बाड़ी!मालिन के ई बात सुनिके माई ओह लोग के जहवां बाड़ी उहंवें सुखी-सम्पन्न होखे के वर देत बाड़ी-

धियवा जुड़ासु मालिन, आपन ससुरा,पतोहिया तोर
आपन नइहर जुड़ासु,पतोहिया तोर!

आखिर में सभके इहे विनती होला कि जवन असीस मइया ओह मालिन के दिहनीं, ऊहे फलाना-चिलाना मरद-मेहरारू के दीं-

जवन असिसिया मइया मालिन के दिहनीं कि ओइसन
मोर फलाना राम के दीं, मइया ओइसन
मोर फलानी देइ के दीं, मइया ओइसन!

जवना तरे देवी माई लोकमंगल के कामना करेली, ओही तरी निमियो लोकमंगल के भाव से लबरेज़ रहेला.साइत एही से देवियो मइया ओकरे जुड़छांह में रहल आ झुलुहा झूलल पसन करेली.

निमिया के फेंड़ जनि काटहु
जवन फेंड़ साधु-सन्त नियर सृष्टि के जिनिगी देत होखे, जियतार बनवले राखत होखे, ओकरा के तहस-नहस करे, काटत जाए के उतजोग कतना अमानवीय बा,एह प सउंसे समाज के अखियान करे के चाहीं.
शरदे ऋतु से आपन पतई झारिके लांगट भइला का बावजूद बसंत के अगवानी में झोंप के झोंप फूलन से लदराइल नीम अपना मादक गमक से पूरा परिवेश के गमगमावत रहेला आ ओकर टूसा,आल्हर पतई तन-मन में ताजगी भरत रहेले.चइत के चांदनी में ओकर शीतल बतास झर-झर रसबुनिया टपकावेला-

छिटकत चइत के चंदनिया हो रामा
निमिया निहारे
कामिनी आ कंत के अगिनिया हो रामा
निमिया निहारे
झर-झर बहाइ रसबुनिया हो रामा
निमिया निहारे!

एही से बाबा जब नीम के गांछ काटल चाहत बाड़न,त बेटी दसों नोह जोरिके अइसन ना करे के निहोरा करत बाड़ी. जइसन ई नीम गांछ, ओइसहीं हम तहार बेटी. नीम पर चिरई-चुरुंग के बसेरा बा,जवन नीम के फेंड़ कटाते उड़िके दोसरा जगहा बसेरा बना लीहें स आ ई घर श्मशान बनि जाई. बेटियो त चिरइए नू होले. जब बेटी के दुख दिआई,त ऊ ससुरा जाके कबो ना आई. फेरु त माई आ बाबूजी अकसरुआ हो जइहन.का बेटी के बिछोह सुख से जीए दी?

बाबा, निमिया के फेंड़ जनि काटहु
निमिया चिरइया बसेर,
जब ई चिरइया उड़ि-पड़ि जइहें
रहि जाई घरवा अकेल.

आजु समय के तगादा बा कि चिरई-चुरुंग नियर चहचहात बेटी के बचावल जाउ आ भरपूर नेह-छोह दिहल जाउ. ओइसहीं बेटिए नियर नीम के फेंड़ के बचावल जाउ आ ओइसने नेह-नाता जोड़ल जाउ,जइसन हमनीं के लोक में पारंपरिक ढंग से चलल आवत बा. तबे हमनीं के जिनिगी में अमन चैन हासिल हो पाई आ एकर जीवंतता बरकरार रही. (डिस्क्लेमर- लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)



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