बिहार के दिग्गज मार्क्सवादी नेता कॉमरेड गणेश शंकर विद्यार्थी का निधन, सियासी और साहित्यिक गलियारे में शोक

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पटना. बिहार के दिग्गज वामपंथी नेता, सीपीएम के राज्य सचिव और पोलित ब्यूरो के सदस्य रहे गणेश शंकर विद्यार्थी (Ganesh Shankar Vidyarthi) का पटना के एक निजी अस्पताल में बीती रात निधन हो गया. वे 97 साल के थे. उनके निधन पर कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े नेताओं, साहित्यकारों और पत्रकारों ने गहरी संवेदना व्यक्त की है. स्वर्गीय विद्यार्थी के दामाद और वरिष्ठ पत्रकार अगस्त्य अरुणाचल ने बताया कि पिछले दशहरे के समय कमजोरी के चलते गिर गये थे जिससे छाती की रिब टूट गई थी. पटना में इलाज के बाद दिसम्बर में अस्पताल से घर आ गए थे, लेकिन कोरोना (COVID-19) पीड़ित होने के कारण फिर पटना के रूबेन अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. सोमवार रात अस्पताल में ही अंतिम सांस ली.

आरंभिक जीवन और संघर्ष

नवादा जिले के रजौली में 01 सितम्बर 1924 को एक बड़े जमींदार और प्रतिष्ठित किसान परिवार में जन्में गणेश शंकर विद्यार्थी बाल्यकाल में ही आजादी के आंदोलन से जुड़ गये. बताते हैं कि जब 12 साल के थे तो नवादा के सरकारी भवन पर तिरंगा फहराने के जुर्म में गिरफ्तार हो गए. आजादी के बाद उनका झुकाव वामपंथ की ओर हुआ. बड़े परिवार में जन्म लेने के बावजूद गांव-गरीबों और मेहनतकश जनता की वे आवाज बने. ताउम्र जन समस्याओं को लेकर संघर्ष करते रहे. आम जन के बीच रहे और अंतिम समय तक सक्रिय रहे.

वे पहली बार 1977 में नवादा से जीतकर विधानसभा पहुंचे. कई सालों तक बिहार में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव और पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्य रहे. दिसंबर महीने में भाकपा माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य और पार्टी के राज्य सचिव कुणाल सहित कई नेता रुबन अस्पताल में उनका हालचाल लेने गए थे.राजनेता, वामपंथी दल से जुड़े लोगों और साहित्यकारों ने दी श्रद्धांजलि 

जनवादी लेखक संघ, बिहार के राज्य सचिव प्रोफेसर नीरज सिंह ने श्रद्धांजलि देते हुए लिखा है.
देश के प्रख्यात कम्युनिस्ट नेता और विचारक गणेश शंकर विद्यार्थी अब हमारे बीच नहीं रहे. वे पुरानी पीढ़ी के वैसे राजनेताओं में अग्रणी थे जिन्होंने अपनी राजनीतिक सक्रियता के बीच भी साहित्य और संस्कृति से आजीवन अपना गहरा संबंध बनाये रखा था. साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों के प्रति वे बहुत ही सम्मान का भाव रखते थे. उनके निधन से राजनीति और साहित्य को जोड़ने वाला एक मजबूत सेतु हमारे बीच नहीं रहा. विनम्र श्रद्धांजलि.

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आलोक कुमार ने इन शब्दों में दी है श्रद्धांजलि

12 वर्ष की अल्पायु में अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ नवादा में हुकूमत की प्रशासनिक इमारत पर तिरंगा फहराने वाले, देश में वामपंथी विचारधारा के अग्रणी अग्रदूत, 97+ की उम्र में नौजवानों से भी ज्यादा दमखम व संघर्ष का जज्बा, राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में शुचिता के प्रतीक, बिगड़ते स्वास्थ्य के बावजूद जनसरोकार के लिए सदैव सक्रिय कॉमरेड गणेश शंकर विद्यार्थी ने आज अपनी जिंदगी और अपने नश्वर शरीर को पूर्णविराम दे दिया. आप तो कहते थे ” सैंचुरी बना कर ही जाऊँगा ” मगर शायद इहलोक को आपकी अगुवाई की जरूरत ज्यादा होगी तभी तो ईश्वर ने आपको बुला लिया.  बहुत याद आएगी संघर्ष व दृढ़ता की प्रतीक आपकी लाठी, खलेगा आपके सान्निध्य से वंचित होना, सदैव साथ रहेंगी बचपन से लेकर आज तक की आपसे जुड़ी तमाम यादें, अनुकरणीय रहेगा आपका विराट व्यक्तित्व.

जन संस्कृति मंच से जुड़े कृष्णा यादव कृष्णेदु ने इन शब्दों में कॉमरेड को याद किया है, बिहार के प्रथम पंक्ति के कम्युनिस्ट नेता कॉमरेड गणेश शंकर विद्यार्थी का निधन सम्पूर्ण वामपंथी आंदोलन के लिए गहरी क्षति!

बागी आलोक राजपूत का पोस्ट

वामपंथी राजनीति के स्तम्भ, सीपीएम के राज्य सचिव रहे, पूर्व विधायक गणेश शंकर विद्यार्थी  का निधन एक युग का अंत है. स्वतंत्रता सेनानी गणेश दा एक चलंत इतिहास थे. बड़े परिवार में जन्म लेकर भी उन्होंने गरीबों-शोषितों की लड़ाई का रास्ता चुना. वैचारिक भिन्नता होने के बावजूद वे अजातशत्रु थे. ऐसे महामानव के देहावसान से राजनीतिक-सामाजिक जीवन में आई रिक्तता की भरपाई संभव नहीं है. आज की राजनीति की दशा और दिशा को देखने के बाद लगता नहीं है कि कोई दूसरा गणेश शंकर विद्यार्थी पैदा होगा. भावभीनी श्रद्धांजलि कामरेड.

पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता गौतम चौधरी ने इन शब्दों में अपनी श्रद्धांजलि दी है
रजौली निवासी 97वर्षीय वयोबृद्ध परम आदरणीय वामधर्मी राजनेता कामरेड श्री गणेश शंकर विद्यार्थी जी नहीं रहे. बड़े जमींदार और प्रतिष्ठित किसान परिवार में जन्में और गणेश दा के नाम से मशहूर मृदुभाषी लोकप्रिय व्यक्तित्व के सरल नेता विद्यार्थी जी छात्र जीवन से प्रगतिशील रहे. गरीबों, दलितों, उपेक्षितों, शोषितों के मसीहा गणेश दा 95 वर्ष की आयु तक सक्रिय रहे. 1964 के साम्यवादी वैचारिक विभाजन के बाद गणेश दा सीपीएम के साथ जाना तय किये. आप सम्मानित कामरेड नेता थे. गणेश दा को सादर श्रद्धांजलि.



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