बॉक्सिंग में विकास और सिमरनजीत लायेंगे मेडल- अखिल कुमार | India Olympics 2020 Tokyo Shooting Games Vikas Simranjit medals boxing Akhil Kumar nodakm | – News in Hindi

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टोक्यो ओलंपिक्स में भारत के लिए निशानेबाज़ी के बाद अगर सबसे ज़्यादा पदकों की उम्मीद किसी और खेल से शायद है, तो वो मुक्केबाज़ी ही है. इस बार रिकॉर्ड नौ मुक्केबाज़ों ने खेलों के महाकुंभ के लिए शिरकत की है, जिसमें से 5 पुरुष वर्ग से और बाकि की 4 महिला वर्ग से हैं. 2008 बीजिंग ओलंपिक्स के दौरान, बस पदक जीतते-जीतते रह गए पूर्व मुक्केबाज़ अखिल कुमार से जब हमने इस मुद्दे पर बात की है, तो उनका साफ कहना था कि 9 की संख्या को देखकर भावना में ना बहें.

“आपको मुक्केबाज़ों की संख्या ज्‍यादा इसलिए लग रही है, क्योंकि आप इस तुलना अतीत से कर रहें हैं. लेकिन, आप ये भूल रहें हैं कि पहले महिला मुक्केबाज़ ओलंपिक्स में नहीं भाग लेती थी. इसलिए इस बार चार महिलाओं के होने से आपको दल बड़ा दिख रहा है. लेकिन, हकीकत यही है कि लगभग इतने ही बॉक्सर लंबे समय से ओलंपिक्स में भारत के लिए भाग लेते आ रहें हैं.”

जो इतिहास में नहीं हुआ, इस बार टोक्यो में होगा!इतिहास को टटोलें तो अब तक भारत ने मुक्केबाज़ी में अब तक सिर्फ दो मेडल ही जीते हैं. 2008 में विजेंद्र सिंह के मेडल ने ना सिर्फ उनके राज्य हरियाणा, बल्कि पूरे भारत में मुक्केबाज़ी की संस्कृति में ज़बरदस्त बदलाव आया. वहीं, लंदन ओलंपिक्स में मैरी कॉम की कामयाबी ऐसी रही कि उनके जीवन पर जो फिल्म बनी वो भी सुपरहिट हो गई.  अखिल कुमार का मानना है कि जितने मेडल अब तक भारत ने अपने इतिहास में मुक्केबाज़ी में जीते है, उसकी बराबरी वो अकेले टोक्यो खेलों के दौरान ही कर सकती है.“

इतनी सकारात्मक सोच और ज़बरदस्त उम्मीद की वजह है कि हाल के सालों में मुक्केबाज़ी फेडरेशन, खेल-मंत्रालय और मुक्केबाज़ों के बीच आपसी ताल-मेल बहुत ही बढ़िया रहा है. पहले, अलग-अलग तरह के कई ग्रुप हुआ करते थे, जो इस खेल और खिलाड़ियों को अलग-अलग दिशा में भटकाते थे. लेकिन, अब राजनीतिक तौर पर भी खेलों को लेकर बदलाव दिख रहा है. आप देखें ना किस तरह से भारत के प्रधानमंत्री खुद ही युवा खिलाड़ियों की हौसला अफज़ाई के लिए आगे आ जातें हैं.”

पुरुष वर्ग में अमित पंघाल और विकास पर है दारोमदारइस ओलंपिक्स में, पुरुष वर्ग की टीम में, यूं तो 5 मुक्केबाज़ हैं. जिसमें, 52 किग्रा में अमित पंघाल, 63 किग्रा में मनीष कौशिक, 69 किग्रा में विकास कृष्णन, 75 किग्रा में आशीष कुमार और 91 प्लस में सतीश कुमार शामिल हैं. इस बार, पदक जीतने के सबसे बड़े दावेदार अपना पहला ओलंपिक्स खेलने वाले पंघाल और तीसरी बार शिरकत करने वाले विकास पर है. हरियाणा के रोहतक जिले में एक किसान परिवार से आने वाले अमित इस समय दुनिया के नंबर वन खिलाड़ी हैं.

इतिहास गवाह है कि आज तक भारत का कोई भी मुक्केबाज़ नंबर एक की हैसियत से खेलों के महाकुंभ में नहीं पहुंचा है. अगर रैंकिग के आधार पर मेडल जीतने का पैमाना तय किया जाए, तो अमित को गोल्ड जीतना चाहिए. लेकिन, हम सब जानते हैं कि रैंकिंग एक अलग बात है और ओंलपिक्स रिंग्स के महादबाव वाले लम्हें में अपनी सर्वोच्चता साबित करना क दूसरी बात. उम्मीदों के दबाव के आगे कहीं अमित बिखर तो नहीं जायेंगे?

“भले ही अमित का ये पहला ओलंपिक्स हो, लेकिन वह Asian games और कॉमनवेल्‍थ जैसे बड़े मुकाबलों का हिस्सा रह चुके हैं. मैं निजी अनुभव से आपको कह सकता हूं कि जब बॉक्सर एक बार रिंग के अंदर होता है, तो उसे सिर्फ अपना विरोधी ही दिखता है और जीत की उम्मीद. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि विरोधी की रैंकिंग क्या है और वो ओंलपिक्स में हैं या किसी अन्‍य खेल में. कुछ साल पहले अमित को मैनें उज़बेकिस्तान के एक मुक्केबाज़ से हारते हुए देखा था, लेकिन तब भी उन्होंने अपने खेल से प्रभावित किया था. तब, मुझे एहसास हुआ था कि ये खिलाड़ी लंबी रेस का घोड़ा साबित हो सकता है.” ऐसा अखिल कहतें हैं.

विकास कृष्‍णन से सभी ने लगा रखी हैं उम्‍मीदें
बहरहाल, अखिल मानते हैं कि उनके लिहाज से अमित या किसी औऱ बॉक्सर के मुकाबले अनुभवी विकास कृष्णन के मेडल जीतने के आसार सबसे ज़्यादा हैं.“ आपको तो याद ही होगा 2018 का कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स का फाइनल, जहां उन्होंने कैमरून के मुक्केबाज़ को कैसे शिकस्त दी थी? (विकास ने तब Dieudonne Wilfried Seyi Ntsengue को 75kg category में हराया था). इसके अलावा, एशियाई खेलों में भी विकास ने अपना जलवा बिखेरा था. उनका दिमाग काफी तेज़ चलता है. उनसे ज़्यादा चालाक दिमाग का कोई भी भारतीय बॉक्सर नहीं है, इसलिए मैं उन पर दांव लगा रहा हूं.”

अखिल की बातों में, विकास की संभावनओं को लेकर एक अभूतपूर्व भरोसे की झलक मिलती है. विकास के साथ एक फायदा और यह भी है कि वो बायें हाथ के मुक्केबाज़ और अब वो 69 kg वर्ग में खेल रहें हैं. इन दोनों के अलावा आशीष कुमार (75kg) और मनीष कौशिक (63kg) भी चौंकाने वाले नतीज दे सकतें हैं. लेकिन, अखिल के मुताबिक, सतीश कुमार (+91kg) एक बेहद स्पेशल बॉक्सर हैं. क्योंकि, इस कैटगरी में शिरकत करने वाले वो पहले भारतीय है, जो एक बहुत बड़ी बात है. पूर्व ओलंपियन अखिल कुमार इस बार सतीश को छुपा रुस्तम बॉक्सर मानतें हैं.

कितना कुछ बदल गया डेढ़ दशक में!
अखिल के समकालीन विजेंद्र सिंह ने जब बीजिंग खेलों के दौरान कांस्य पदक जीता, तो उसके बाद से भारत में मुक्कबाज़ी का खेल और लोकप्रिय हो गया. आलम ये है कि मौजूदा दौर के बॉक्सर ही नहीं उनके परिवार वालों की जानकारी इतनी ज़्यादा बढ़ गयी है कि उन्हें भी पता है कि मुक्केबाज़ों की दिनचर्या कैसी होना दाहिए, उन्हें क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए. सोशल मीडिया, इंटरनेट और यूट्यूब के ज़रिए नई-नई तकनीक और रणनीति से भी मौजूदा खिलाड़ी खुद को रुबरु रखतें हैं और इसकी झलक हमें उनके आत्म-विश्वास में देखने को मिलती है.“

नई पीढ़ी के मुक्कबाज़ों में जीत के लिए एक अलग भूख दिखती है. चाहे पुरुषों की बात करें या फिर महिलाओं की. ये एक बहुत बड़ा बदलाव भारतीय खेलों में देखने को मिला है और इसका क्रेडिट मैं काफी हद तक अभिनव बिंद्रा को देता हूं. बिंद्रा के पास वो तमाम सुख सुविधायें बचपन से ही मौजूद थी, जो कोई आम एथलीट उम्मीद कर सकता है. इसके बावजूद, वे हर कीमत पर गोल्ड जीतने का इरादा रखते थे.” ये कहना है मेलबर्न कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान गोल्ड मेडल देश के लिए जीत चुके अखिल कुमार का.

मैरी कॉम से बड़ी दावेदार सिमरनजीत!
अगर महिला वर्ग की टीम की बात करें तो निश्चित तौर पर 51 किग्रा में एमसी मेरी काम पर सबसे पहले आपकी नज़र जायेगी. लेकिन, मैरी के अलावा 60 किग्रा में सिमरनजीत कौर भी चौंकाने वाले नतीजे ला सकती हैं, जबकि  69 किग्रा में लोवलीना बोरगोहेन और 75 किग्रा में पूजा रानी भी उम्मीद करेंगी कि वे मेडल जीतने का सपना पूरा करें.

ओलंपिक्स में मेडल जीतना सिर्फ मेहनत, लगन और भूख से नहीं होता है. नाज़ुक लम्हें में भाग्य का भी साथ होना उतना ही ज़रुरी होता है. कई बार रैफ्री के ग़लत फैसलों के चलते भारतीय बॉक्सर को अतीत में मेडल से हाथ धोना पड़ा है, लेकिन उनकी शिकायत को सुनने वाला या फिर उनके लिए लड़ने वाला कोई नहीं होता था. अखिल कुमार मानते हैं कि अब भारतीय बॉक्सिंग में काफी कुछ बदल गया है.“ रिंग के बाहर भी काफी कुछ बदल गया है. जिस तरह से बीसीसीआई के मज़बूत होने से भारतीय क्रिकेट टीम पर फर्क पड़ा है, ठीक उसी अंदाज़ में हमारे फेडरेशन के मज़बूत होने से, उनकी भागीदारी और सक्रियता से मुक्केबाज़ों को काफी मदद मिली है.

खेल मंत्रालय ने भी अपनी भूमिका तरीके से निभाई है तभी तो आज ओलंपिक में जाने से पहले प्रधानमंत्री खिलाड़ियों से मिलतें हैं, उन्हें शुभकामनायें देतें हैं. वर्ना पहले जब-तक मेडल नहीं जीतते थे, तब तक चाय पर मुलाकात या फिर फोटो खिंचाने का मौका खिलाड़ियों को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के साथ भला कहां मिलता था?”

महिला मुक्कबाज़ों में अखिल को सिमरनजीत कौर से ठीक वैसी ही उम्मीदें हैं, जैसे कि वो विकास कृष्णन से कर रहें हैं. मैरी कॉम के बारे में अखिल सिर्फ एक बात कहतें हैं कि उनकी सोच बिलकुल बिंद्रा जैसी ही है. आज मैरी कॉम के पास मेडल भी हैं, नाम भी, पैसे भी लेकिन अपने मेडल का रंग बेहतर करने की ललक ने उन्हें 6 बार वर्ल्ड चैंपियन बनाया है.

अगर वाकई में उम्मीद और अपनी साख की मुक्केबाज़ नतीजों में तब्दली करने में कामयाब होते हैं, तो टोक्यों ओलंपिक्स भारतीय मुक्केबाज़ों के लिए सबसे यादगार अध्याय साबित हो सकता है.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)



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