योगेश कथूनिया के लिए फिजियो बनीं मां और फिर व्‍हीलचेयर से उठाकर बेटे को पोडियम तक पहुंचा दिया

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नई दिल्‍ली. टोक्‍यो पैरालंपिक (Tokyo Paralympics ) में पुरुषों की चक्का फेंक इवेंट के एफ56 वर्ग में इतिहास रचने वाले भारत के योगेश कथूनिया (Yogesh Kathuniya) ने सिल्‍वर मेडल जीतने के बाद अपनी मां का शुक्रिया अदा किया. दरअसल, वो अपनी मां के दम पर ही आज यहां तक पहुंचे. उनकी मां ने उन्‍हें एक नहीं बल्कि 2 बार जन्‍म दिया. जन्‍म के 9 साल बाद उनकी मां ने ही उन्‍हें गंभीर बीमारी की चपेट में आने के बाद जीना सिखाया.
अपने बेटे को नई जिंदगी देने के लिए योगेश की मां ने पढ़ाई की और फिजियो बनी. ताकि वो अपने बेटे को फिर से पैरों पर खड़ा कर सके. दरअसल जब योगेश 9 साल के थे, तब तक उनकी जिंदगी आम बच्‍चों की ही तरह चल रही थी.

द न्‍यू इंडियन एक्‍सप्रेस के अनुसार वह चंडीगढ़ के आर्मी पब्लिक स्‍कूल में पढ़ते थे, जहां उनके पिता ज्ञानचंद की पोस्टिंग थी, मगर इसके बाद उन्‍हें गुइलेन बैरे सिंड्रोम नाम की एक दुर्लभ विकार का सामना करना पड़ा, इस बीमारी की चपेट में आने वाले व्‍यक्ति के चारों अंगो की मांसपेशियों में कमजोरी होती है. इस वजह ने 2006 में योगेश व्‍हीलचेयर पर आ गए.

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मां से बेटे की ये हालात देखी नहीं गई और योगेश की मां मीना देवी ने अपने बेटे को जल्‍द से जल्‍द पैरों पर खड़ा करने के लिए फिजियोथेरेपी की पढ़ाई करने का फैसला लिया. मां की हिम्‍मत, जज्‍बे के कारण ही 3 साल में ही योगेश ने चलना शुरू कर दिया. योगेश ने कहा कि उन्‍हें परिवार की तरफ से जो सपोर्ट मिला, वो इसका कर्जा कभी नहीं उतार सकते. खासकर मां का, जिन्‍होंने फिजियोथेरेपी सीखी, ताकि मैं अपनी मांसपेशियों में ताकत हासिल कर पाऊं.

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