लखनऊ में ‘अपराजेयता’ की बयार, यूपी में ‘योगी मॉडल’ की बहार और ‘बहनजी’ के लिए आजमगढ़ का पाठ

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लखनऊ: लखनऊ में ‘सियासी अजेयता’ की हवा चल रही है. इस महीने की शुरुआत में चित्रकूट में भारतीय जनता पार्टी की राज्य इकाई के प्रशिक्षण सत्र के दौरान एक आश्वस्त मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ ने 2024 में 75 लोकसभा सीटों के अपने पहले के लक्ष्य को बढ़ाकर सभी 80 सीटों पर जीत हासिल करने की महत्वाकांक्षा योजना पर बात की.

समाजवादी पार्टी के खेमे में, जिस पार्टी ने 4 महीने से भी कम समय पहले राज्य के चुनावों में 111 सीटों के साथ कुछ लड़ाई लड़ी थी, उसका ध्यान 2024 के बजाय 2027 के विधानसभा चुनाव पर अधिक लगता है. अखिलेश यादव द्वारा करहल की अपनी विधानसभा सीट को बनाए रखने, आजमगढ़ और रामपुर के अपने गढ़ों में लोकसभा उपचुनाव के दौरान उनके प्रचार करने नहीं जाने से ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है, जहां हार ने पार्टी कैडर को निराश और भ्रमित कर दिया है.

छोटे-छोटे मुकाबलों में भी यह दिख रहा है. राज्य में पिछले हफ्ते हुए एमएलसी चुनावों को ही लें, एक सपा उम्मीदवार का नामांकन पत्र कम उम्र के होने के कारण खारिज कर दिया गया था. अखिलेश यादव उस महिला एमएलसी प्रत्याशी के प्रस्तावकों में से एक थे. इसके बावजूद उनके नामांकन पत्र को क्राॅस चेक नहीं किया गया. सपा सिर्फ 3 लोकसभा सीटों पर सिमट गई है. यूपी से बसपा के 10 और कांग्रेस का 1 लोकसभा सांसद है.

यूपी बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने लखनऊ में News18 को बताया कि 2024 में बीजेपी को असली चुनौती सपा की बजाय बसपा से मिल सकती है. बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘यूपी में, मुस्लिम-दलित संयोजन (जिस पर बसपा की नजर है), मुस्लिम-यादव संयोजन (जो कि सपा का मजबूत पक्ष है) की तुलना में बहुत बड़ा है. मायावती ने आजमगढ़ उपचुनाव से एक सबक सीखा है, जहां उनके उम्मीदवार गुड्डू जमाली भारी संख्या में वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे, जिससे सपा की हार सुनिश्चित हुई. बसपा को पूरी तरह खारिज करना जल्दबाजी होगी.’

भाजपा का मानना ​​है कि मायावती अब मुस्लिम-दलित गठबंधन पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं और विशेष रूप से विधानसभा चुनावों में सपा को वोट देने के बाद मुसलमान बसपा के पाले में वापस जा रहे हैं. बसपा के दो जिला स्तरीय नेताओं ने News18 को बताया कि मुसलमानों को एहसास हो गया है कि सपा के साथ जाने का अब तक कोई नतीजा नहीं निकला है. बसपा के पास 10 लोकसभा सीटें हैं, हालांकि सपा नेताओं का कहना है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि 2019 के सपा-बसपा गठबंधन के दौरान सपा को ‘कठिन शहरी सीटें’ मिलीं. सपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘मुसलमानों ने देखा है कि कैसे मायावती ने भाजपा के राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों का समर्थन किया है… वे जानते हैं कि वह भाजपा की बी-टीम हैं.’

योगी मॉडल

पिछले बुधवार को आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे से राज्य की राजधानी तक यात्रा करते हुए, कई ट्रकों को नए बुलडोजर ले जाते हुए देखा गया, जो कि ‘योगी मॉडल’ के रूप में जाना जाने लगा है. बुलडोजर द्वारा ‘अवैध संपत्तियों’ को नष्ट करने और ‘अतिक्रमण की भूमि’ की सफाई करने से, पिछले यूपी चुनावों में भाजपा को फायदा हुआ है. हाल ही में, कर्नाटक के सीएम बसवराज बोम्मई (एक भाजपा कार्यकर्ता की हत्या को लेकर अपनी पार्टी के कैडर से आलोचना के बाद) ने कहा कि यदि आवश्यक पड़ी तो उनकी सरकार यूपी मॉडल को अपनाएगी.

यूपी के एक शीर्ष नौकरशाह ने News18 को बताया, ‘सीएम योगी आदित्यनाथ कोई भी निर्णय लेने में नहीं हिचकिचाते हैं. उनके निर्णयों में पूरी स्पष्टता है. उन्होंने कानून और व्यवस्था को भाजपा के लिए सकारात्मक मुद्दा बना दिया है, जिस पर वोट मिल रहा है. जबकि अतीत में, यूपी में कानून और व्यवस्था के मुद्दे पर सरकारें सत्ता से बाहर हुई हैं. जो लोग कभी उत्तर प्रदेश नहीं आए हैं, वे भी योगी मॉडल के बारे में बातें कर रहे हैं.’

एक अन्य प्रमुख अधिकारी ने कहा कि योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल में धार्मिक स्थलों से लगभग 75,000 लाउडस्पीकरों को हटाना उनके सुशासन के मॉडल को दर्शाने वाला एक बड़ा कदम था. एक अन्य प्रमुख अधिकारी ने कहा, ‘योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल में धार्मिक स्थलों से लगभग 75,000 लाउडस्पीकरों को हटाना उनके सुशासन के मॉडल को दर्शाने वाला एक बड़ा कदम था. अधिकारी ने कहा, ’मंदिरों और मस्जिदों दोनों से लाउडस्पीकर हटा दिए गए. कुछ मामलों में जहां मंदिर और मस्जिदें सटे हुए थे, वहां पहले मंदिर का लाउडस्पीकर हटाया गया ताकि अधिकारियों के वहां जाने पर मस्जिद को कोई आपत्ति न हो. यह सब बिना किसी परेशानी के किया गया और यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया कि धार्मिक स्थल परिसर के अंदर ही आवाज बनी रहे.’

एक अन्य अधिकारी ने बताया, मुख्यमंत्री स्पष्ट थे कि न तो सड़कों पर नमाज की अनुमति दी जाएगी और न ही चौराहों पर हनुमान चालीसा का जाप किया जाएगा. भाजपा नेताओं का कहना है कि इससे लोगों में यह धारणा पैदा हुई है कि योगी बेकार की चाजों को बर्दाश्त करने वाले मुख्यमंत्री नहीं हैं और अगर कानून तोड़ा जाता है या कोई दंगा की स्थिति पैदा करता है तो कार्रवाई होगी. बीजेपी अब इस ‘योगी मॉडल’ की यूपी में जमकर मार्केटिंग कर रही है.

बीजेपी का अगला प्रदेश अध्यक्ष?

2024 के लोकसभा चुनावों से पहले, स्वतंत्र देव सिंह के मार्च में राज्य सरकार में मंत्री बनने और पिछले महीने राज्य अध्यक्ष की कुर्सी छोड़ने के बाद, भाजपा अब अपने नए राज्य अध्यक्ष के चुनाव पर ध्यान केंद्रीय किए हुए है. बसपा से 2024 के लोकसभा चुनावों में प्रत्याशित चुनौती का मुकाबला करने के लिए भाजपा के पास एक विकल्प यह भी है कि वह किसी दलित चेहरे को राज्य अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करे.

ऐसी भी अटकलें हैं कि बीजेपी डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को अपने राज्य प्रमुख के रूप में वापस ला सकती है. क्योंकि 2017 के विधानसभा चुनावों में राज्य प्रमुख के रूप में उनके नेतृत्व में पार्टी को बड़ी जीत मिली थी.उनकी जगह किसी दलित नेता को डिप्टी सीएम बनाया जा सकता है. स्वतंत्र देव सिंह की तरह केशव प्रसाद मौर्य यूपी बीजेपी के ओबीसी चेहरा हैं. राजनीतिक गलियारों में एक और चर्चा है कि राज्य की राजनीति में ठाकुर-ब्राह्मण समीकरणों को संतुलित करने के प्रयास में पूर्व डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा, को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जा सकता है. सीएम योगी से शर्मा के अच्छे संबंध हैं.

भ्रष्टाचार के आरोपों में पीडब्ल्यूडी मंत्री जितिन प्रसाद के सहयोगी के निलंबन और राज्य मंत्री दिनेश खटीक के इस्तीफे जैसे हालिया विवादों ने राज्य सरकार को कुछ समय के लिए परेशान किया है. लेकिन 2024 तक उत्तर प्रदेश में भाजपा की नींव कोई दल हिला पाएगा, इसकी संभावना नहीं दिखती है. देश के सबसे बड़े राज्य पर सीएम योगी आदित्यनाथ का नियंत्रण भी लगभग बरकरार दिख रहा है.

Tags: CM Yogi Aditya Nath, Uttar pradesh news, Yogi government



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