वक्त के साथ बदल गया है तलवारबाजी का अंदाज, जानिए क्या है नए नियम और फॉर्मेट

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फेंसिंग खेल के नियम काफी आसान होते हैं

फेसिंग (Fencing) 1896 से ओलिंपिक खेलों का हिस्सा हैं हालांकि अब इसमें काफी बदलाव आ चुके हैं

नई दिल्ली. फेंसिंग 1896 से मॉर्डन ओलिंपिक की शुरुआत के समय से ही फेंसिंग खेलों का हिस्सा हैं. हालांकि शुरुआत वह कभी लोगों की नजर में नहीं आया औऱ हमेशा लाइमलाइट से दूर ही रहा. वक्त के साथ-साथ खिलाड़ियों के पहनावे से लेकर तलवार तक हर चीज में बदलाव आया. आज फेंसिंग पूरी तरह से इलेक्ट्रोनिक तौर पर खेला जाता है. जहां हर सही अंक हरी लाइट औऱ गलत अटैक लाल रंग से दर्शाया जाता है.

पीस्ट पर खेली जाती है तलवारबाजी
फेसिंग के लिए दोनों खिलाड़ी एक प्लेटफॉर्म पर खड़े होते हैं जिसके पीस्ट कहा जाता है. मैच की शुरुआत में दोनों गार्ड लाइन पर खड़े होते हैं जो कि दोनों खिलाड़ियो के क्षेत्र को बांट रही मिड लाइन से तीन मीटर दूर होती है. इस लाइन से दो मीटर पीछे पहली वॉर्निंग लाइन औऱ फिर दूसरी वॉर्निंग लाइन होती है. वहीं पीस्ट के अंत में रेड जोन होता है.

तीन प्रकार के हैं तलवारबाजी के फॉर्मेटद फॉयल – इस फॉर्मेट में सबसे हल्की तलवार का इस्तेमाल किया जाता है जिसका वजन 500 ग्राम से कम होता है औ वह सबसे ज्यादा फ्लेकिसबल होता है. हालांकि इसमें खिलाड़ी केवल तलवार की नोंक से ही प्रहार कर सकता है. खिलाड़ियों को विरोधी के कमर और चेहरे के नीच के हिस्से में ही अटैक करने की अनुमति होती है. इसमें खिलाड़ी को अटैकिंग केल दिखाना होता है जिसके दम पर उन्हें प्राथमिकता दी जाती है और फिर अंक दिए जाते हैं. टाइम खत्म होने के बाद ज्यादा अंक वाले खिलाड़ी को या पहले 15 अंक हासिल करने वाले खिलाड़ी को विजेता घोषित किया जाता है.

साबरे- इसकी तलवार फोइल से थोड़ी भारी होती है. खिलाड़ी को तलवार के किसी भी हिस्से से अटैक करने की अनुमति होती है. खिलाड़ी को विरोधी के कमर के ऊपर किसी भी हिस्से पर अटैक करने की अनुमति होती है. जो भी खिलाड़ी पहले 15 अंक हासिल करता है उसे विजेता घोषित किया जाता है.
एपे– सबसे आसान होती है , शरीर के किसी भी हिस्सा में अटैक करने वाला खिलाड़ी हासिल करता है अंक जिसके बाद वह वापस गार्ड पॉजीशन पर आ जाते हैं. अगर दोनों का अटैकिंग समय एक ही है तो दोनों को अंक दिया जाता है. टाइम खत्म होने के बाद ज्यादा अंक वाले खिलाड़ी होता है विजेता. टाई होने के बाद पहला अंक हासिल करने वाला होता है विजेता.

हालांकि 2012 में लंदन में हुए ओलिंपिक महिला एपे के सिंगल मुकाबले के बाद स्थिति बदल गई.  इस मैच में आखिरी सेकंड में हारने वाली कोरिया की खिलाड़ी की एक तस्वीर से लोगों का ध्यान इस खेल की ओर खींचा था. कोरिया कि शिन लेन ने जजों के फैसले पर अपील की थी. अपील के खारिज होने और हार के बावजूद वह प्लेटफॉर्म पर लंबे समय तक अकेली बैठी रहीं थी.






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