शहाबुद्दीन की मौत के बाद RJD के रूख से क्या नाराज हैं बिहार के मुसलमान ?

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आरजेडी के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन की कोरोना से हुई मृत्यु. (फाइल फोटो)

Shahabuddin Death: दिल्ली की तिहाड़ जेल में सजा काट रहे बिहार के कद्दावर नेता और राजद के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन की कोरोना से मौत हो गई थी. उनकी मौत के बाद बिहार में भी राजनीति शुरू हो गई है.

पटना. बिहार में इन दिनों राजद के कद्दावर नेता और बाहुबली शहाबुद्दीन (Shahabuddin Death) की मौत को लेकर राजनीति जारी है. तीन दिन पहले दिल्ली में कोरोना से हुई शहाबुद्दीन की मौत के बाद जिस तरह से उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में ही किया गया उससे बिहार के मुसलमान (Bihar Muslim) खासे नाराज हैं. यही कारण है कि उनकी अंत्येष्टि में राजद के सबसे बड़े नेता लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) और तेजस्वी यादव के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई. शहाबुद्दीन की मौत के बाद लोग इस बात से ज्यादा नाराज हैं कि उनकी अंत्येष्टि दिल्ली में हुई, जबकि उनका अंतिम संस्कार सीवान में होना चाहिए था. RJD के बड़े नेता का इस्तीफा इस घटना के बाद बिहार में राजद के बड़े मुस्लिम नेता ने भी इस्तीफा दे दिया है जिसके बाद से यह सुगबुगाहट तेज हो गई है कि क्या शहाबुद्दीन की मौत के बाद बिहार के मुसलमान अपने परंपरागत पार्टी यानी राज्य से नाराज चल रहे हैं. राजद के प्रदेश उपाध्यक्ष सलीम परवेज के इस्तीफे के बाद से पार्टी में खलबली मच गई है. बिहार विधान परिषद के पूर्व सभापति रह चुके सलीम परवेज ने अपने इस्तीफे को लेकर बयान भी जारी किया है. उन्होंने इस घटना से आहत होकर ना सिर्फ पार्टी उपाध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया है, बल्कि राजद से भी खुद को अलग कर दिया है. पार्टी से अलग होने के फैसले पर परवेज ने कहा कि मोहम्मद शहाबुद्दीन से मेरा व्यक्तिगत संबंध था, वे मेरे अच्छे मित्र व भाई समान थे. उनके निधन से मर्माहत व स्तब्ध हूं. जेल जाने के बाद से ही अनदेखी का आरोपसलीम परवेज ने कहा कि मो. शहाबुद्दीन पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे. पार्टी के गठन में अहम भूमिका निभाई, राजद के लिए समर्पित नेता रहे लेकिन उनके बीमार पड़ने, तिहाड़ में घटी घटनाओं, एम्स की जगह प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराने, मृत्यु के बाद सस्पेंस बनाने, पार्थिव शरीर देने में आनाकानी करने को लेकर पार्टी के सभी शीर्ष नेताओं की तरफ से चुप्पी साध ली गई जो कि बेहद निराश करनेवाला था. सलीम ने कहा कि शहाबुद्दीन के निधन के बाद भी पार्टी के किसी नेता ने शहाबुद्दीन के बेटे को कोई सहयोग नहीं दिया, न सांत्वना दी. उन्होंने कहा कि अपने सच्चे सिपाही, संस्थापक सदस्य और उसके परिवार के प्रति ऐसी उपेक्षा आपत्तिजनक है, ऐसे में इस पार्टी के साथ अब चलना संभव नहीं है.

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मो. शहाबुद्दीन 1997 में केंद्र से इस्‍तीफा देकर लालू प्रसाद यादव के साथ राज्‍य विधानसभा में वापस आ गए. (फाइल फोटो)

सीवान में क्यों नहीं हुआ अंतिम संस्कार
मालूम हो कि शहाबुद्दीन की मौत के बाद उनके समर्थकों की मांग थी कि उनको सुपुर्द-ए-खाक सीवान में ही किया जाए लेकिन ऐसा नहीं हो सका. उनकी मौत के बाद लालू-तेजस्वी समेत राजद के वरीय नेताओं ने ट्वीट कर के सफाई और श्रद्धांजलि जरूर दी थी, ऐसे में बिहार में मुसलमानों का एक बड़ा तबका राजद के इस रवैये से नाराज है. माहौल को भांपते हुए तुरंत नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर अपना सफाइनामा सबके सामने रख दिया. तेजस्वी लेते दिखे क्रेडिट तेजस्वी ने अपनी सफाई में कहा है कि लालू प्रसाद यादव और उन्होंने खुद सरकार और स्थानीय प्रशासन से गुहार लगाई, खूब दवाब भी बनाया लेकिन सरकार कोरोना प्रोटोकॉल का हवाला देकर सीवान ले जाने की अनुमति नहीं दी. तेजस्वी ने इसके लिए सरकार की हठधर्मिता को जिम्मेदार ठहराया. यही नहीं तेजस्वी ने अपनी सफाई में ये भी कहा कि स्थानीय प्रशासन मोहम्मद शहाबुद्दीन को ITO के बजाए किसी दूसरे कब्रिस्तान में दफनाना चाहती थी लेकिन उन्होंने दिल्ली के कमिश्नर से खुद बातकर दिल्ली ITO कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक की अनुमति दिलाई. क्या ट्वीट मात्र से चल जाएगा काम ? शहाबुद्दीन की मौत के बाद सोशल मीडिया में भी उनके समर्थक राजद को निशाने पर ले रहे हैं तो साथ ही दिल्ली में मौजूदगी के बाद भी किसी नेता के अंत्येष्टि में शामिल नहीं होने को लेकर भी सवाल खड़े कर रहे हैं. शहाबुद्दीन की मौत के बाद बिहार में एनडीए का हिस्सा जीतन राम मांझी इस मामले की न्यायिक जांच की मांग उठा चुके हैं, ऐसे में राजनीति और तेज हो गई है.



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