शहीदों के शहादत की पुण्यभूमि है मेरठ का ‘गगोल गांव’, जानें 1857 की क्रांति के गवाह इस गांव की कहानी

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हाइलाइट्स

गगोल गांव में दी गई थी क्रांतिकारियों को फांसी
शहादत की जगह पर गांव वालों ने बनवा दिए मन्दिर
गांव वाले त्योहारों में करते हैं पूजा

रिपोर्ट- विशाल भटनागर

मेरठ: हिंदुस्तान अपनी आजादी की 75वीं सालगिरह मना रहा है. देश की आजादी के लिए हजारों क्रांतिकारियों ने हंसते हंसते कुर्बानी दे दी. देश का ऐसा कोई हिस्सा नहीं रहा होगा जहां आजादी की लौ न जली हो. उसी कड़ी में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मेरठ भी है. जब भी मेरठ की बात होती है तो यहां के हर गांव से, क्रांतिकारियों की, देश पर मर मिटने वालों की आवाजें सुनाई देती हैं. यहां के हर एक गांव का इतिहास ( history) क्रांति से सीधा जुड़ा हुआ है. 1857 में जब प्रथम स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन शुरू हुआ था तो हर घर से क्रांतिकारियों ने देश को आजाद करने का बीड़ा उठाया था.

कुछ इसी तरह का इतिहास मेरठ से 15 किलोमीटर दूर स्थित गगोल (Gagol) का है. जहां दशहरे के दिन कई क्रांतिकारियों को एक साथ पीपल के पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी गई थी. शहीदों की याद में गांव वालों ने फांसी वाली जगह पर ही उनका मंदिर बनवा दिए. त्योहारों में गांव वाले इन मंदिरों में शहीदों की पूजा कर उनके अमर बलिदान को नमन करते हैं.

दशहरे के दिन दी गई थी फांसी
गांव वालों के अनुसार जब 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों पर आक्रमण किया गया था, तब अमर शहीद धन सिंह कोतवाल के आव्हान पर ग्रामीणों के पूर्वजों ने भी सहभागिता की थी. उन्होंने भी अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में भाग लिया था. इस बात की भनक जब अंग्रेजी हुकूमत को लगी तो अंग्रेजी हुकूमत ने गांव के उन सभी क्रांतिकारियों को फांसी की सजा दे दी थी. अंग्रेजों ने दशहरे के दिन यानी 3 जून 1857 को गगोल गांव के एक कुएं के पास पीपल के पेड़ पर लटकाकर उन क्रांतिकारियों को फांसी दी थी.

त्योहारों पर होती है शहीदों की पूजा
देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संग्राम छेड़ने वाले गगोल के क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया था. अंग्रोजों की मानसिकता थी कि इस तरह की सजा देख अन्य क्रांतिकारियों भी दहशत में आ जाएंगे, लेकिन देश के दीवानों को यह सजा भी पुरस्कार लगती थी. यही कारण है कि देश के शहीदों को याद करते हुए गांव के लोगों ने कुएं के पास ही क्रांतिकारियों के मंदिर बनवा दिए. सभी गांव वाले होली और दिवाली के दिन अमर शहीदों की विशेष पूजा करते हैं. इनके त्याग और बलिदान को याद करते हैं.

क्रांतिकारियों के बलिदानों का गवाह है कुआं
क्रांतिकारियों की शहादत को लेकर NEWS 18 LOCAL से चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय परिसर के इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर विग्नेश त्यागी ने खास बातचीत की. इस दौरान उन्होंने बताया कि, 3 जून 1857 को मेरठ के गगोल गांव में क्रांतिकारियों को फांसी दी गई थी. उन्होंने बताया कि जिस स्थान पर फांसी दी गई थी वहां पीपल के पेड़ के पास एक कुआं बना हुआ है, जिसका उल्लेख ऐतिहासिक तथ्यों में भी पढ़ने को मिलता है.

Tags: Chief Minister Yogi Adityanath, CM Yogi, Meerut news, Uttarpradesh news



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