सेना के नेतृत्व में INDO-PAK युद्ध की स्वर्णिम विजय मशाल भोपाल पहुंची, DGP ने किया स्वागत

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ये मशाल शहीदों के गांव जाएगी.

भोपाल.1971 के युद्ध में भारत की पाकिस्तान (Indo-pak war) पर जीत और बांग्लादेश निर्माण में अपनी शहादत देने वाले वीर शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए स्वर्णिम विजय मशाल निकाली जा रही है.दिल्ली से शुरू हुई ये यात्रा भोपाल पहुंची. पीएचक्यू में स्वर्णिम विजय मशाल का डीजीपी विवेक जौहरी समेत पुलिस अधिकारियों ने स्वागत किया और फिर इसे आगे के लिए  रवाना किया. सेना (ARMY) के नेतृत्व में ये स्वर्णिम विजय मशाल निकाली जा रही है.

1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर भारत के विजय की 50वीं वर्षगांठ के आयोजन की शुरुआत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेशनल वॉर मेमोरियल  में शहीद जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित की थी. उन्होंने उस मौके पर स्वर्णिम विजय मशाल प्रज्ज्वलित की थी. इस मौके पर नेशनल वॉर मेमोरियल की अनन्त ज्योति से चार विजय मशाल प्रज्ज्वलित किए गए थे. ये ‘विजय मशाल’  1971 के युद्ध के परमवीर चक्र और महावीर चक्र पुरस्कार विजेताओं के गांवों सहित देश के विभिन्न हिस्सों में ले जायी जा रही हैं.

कहां ले जाई जाएंगी मशाल…
ये मशाल 1971 के युद्ध के वीर चक्र और महावीर चक्र विजेताओं के गांवों में जाएंगी. इन पदक विजेता वीरों के गांवों औऱ जहां अहम लड़ाई लड़ी गईं, उन जगहों की मिट्टी नेशनल वॉर मेमोरियल लाई जाएगी. 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर विजय हासिल करने की याद में भारत 16 दिसंबर को विजय दिवस के रूप में मनाता है. इसी विजय से बांग्लादेश का निर्माण हुआ था.कहां-कहां से होकर गुजरेगी मशाल…

विजय मशाल सेना के नेतृत्व में देशभर में ले जायी जा रही हैं. मशाल दिल्ली से चलकर मथुरा होते हुए भरतपुर, अलवर, हिसार, जयपुर, कोटा, आदि सैन्य छावनी क्षेत्रों और उनके दायरे में आने वाले शहरों का भ्रमण करती हुई वापस दिल्ली पहुंचेगीं. यात्रा की अवधि एक साल की होगी. यात्रा बांग्लादेश की राजधानी ढाका भी जाएगी.

सेना के नेतृत्व में INDO-PAK युद्ध की स्वर्णिम विजय मशाल भोपाल पहुंची, DGP ने किया स्वागत

जानें क्यों कहा जाता है ‘विजय दिवस’…
16 दिसंबर, 1971 को देश की पश्चिमी सीमा पर बसंतर नदी के किनारे खुले मोर्चे पर भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को हरा दिया था. जनरल नियाज़ी के नेतृत्व पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के सामने सरेंडर कर दिया था. पाकिस्तान ने इस युद्ध में 93 हजार सैनिकों के साथ सरेंडर किया था.इसलिए भारतीय सेना 16 दिसम्बर को ‘विजय दिवस’ मनाती है.


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