सोशल इंजीनियरिंग: उत्तर प्रदेश में यादवों और गैर यादवों के बीच क्या कोई पार्टी कभी बना पाएगी एका?

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हाइलाइट्स

पिछले कुछ सालों से भाजपा सोशल इंजीनियरिंग की देशभर में चर्चा चल रही है.
असंभव कॉम्बिनेशन को साधने के लिए भाजपा लगातार प्रयासरत है.

लखनऊ. यूपी के चुनावों में सोशल इंजीनियरिंग की बहुत चर्चा होती रहती है. यानी ऐसा चुनावी गठबंधन जिसमें शामिल लोग एक दूसरे के खिलाफ होते हुए भी एक साथ खड़े होने को राजी हो जाएं. मायावती की सोशल इंजीनियरिंग कौन भूल पायेगा. तब ये कहा गया था कि मायावती ने ब्राह्मणों और दलितों को एक ही छत के नीचे खड़ा करने में सफलता हासिल कर ली. इसी तरह पिछले कुछ सालों से भाजपा के सोशल इंजीनियरिंग की देशभर में चर्चा चल रही है जिसने अगड़ी और पिछड़ी जातियों को एक ही झंडे के नीचे खड़ा करने में सफलता हासिल की है.

ऐसा ही एक बेमेल गठबंधन है यादवों को गैर यादव पिछड़ी जातियों के साथ खड़ा करना. यूपी विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने इसकी पुरजोर कोशिश की थी. उन्होंने गैर यादव पिछड़ी जातियों में से अहम राजभर, मौर्य, चौहान और पटेल जाति के नेताओं को अपने साथ करके ये सपना देखा था कि यादवों के साथ ये जातियां भी खड़ी हो जाएंगी और वे चुनाव जीत जाएंगे लेकिन ऐसा हो न सका. वे न सिर्फ चुनाव हारे बल्कि चंद हफ्तों में ही उनके गठबंधन की गाठें खुलती चली गईं. अब भारतीय जनता पार्टी इस कोशिश में जुट गई है.

कानपुर के चौधरी हरिमोहन सिंह यादव की पुण्यतिथि के अवसर पर पीएम नरेन्द्र मोदी के संबोधन को इसी नजरिए से देखा जा रहा है. भाजपा ने गैर यादव पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ने में तो एक हद तक सफलता हासिल कर ली है लेकिन यादवों को जोड़ना अभी भी चैलेंज है. तो आखिर ऐसा क्या है कि एक ही समुदाय पिछड़ी जाति के होते हुए भी यादव बिरादरी के साथ इस समुदाय की दूसरी जातियां खड़ी नहीं हो पा रही हैं. आखिर इनका एका क्यों नहीं बन पा रहा है. यूपी वो राज्य है, जहां पिछड़ी जातियों की सबसे बड़ी आबादी रहती हैण्. कुल आबादी का 45 फीसदी से उपर पिछड़ी जातियों का माना जाता है. यही वजह है कि सभी पार्टियों की ये कोशिश होती है कि इस वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा अपने साथ जोड़े रखें.

45 फीसदी से ज्यादा ही पिछड़ी जातियों की कुल आबादी
अब पिछड़ी जातियों की राजनीतिक ताकत को समझने की जरूरत है. वैसे तो आंकड़े अनुमानित ही हैं क्योंकि इनकी कभी सरकारी गिनती नहीं हुई है लेकिन फिर भी माना जाता है कि 45 फीसदी से ज्यादा ही पिछड़ी जातियों की कुल आबादी है. इनमें से 20 फीसदी के लगभग यादव हैं और बाकी गैर यादव पिछड़ी जातियां. यूपी चुनाव में सरकार बनाने के लिए 35 से 40 फीसदी वोट काफी होता है. अखिलेश यादव ने कोशिश की थी कि 20 फीसदी यादव, 18 फीसदी मुसलमान और बाकी की गैर यादव पिछड़ी जातियां उनके साथ आ जाएंगी तो उन्हें कोई हरा नहीं पाएगा. कई जिलों में उन्हें इसका फायदा भी मिला.

सपा और उसके सहयोगियों ने जिले की सभी सीटें जीत लीं लेकिन आखिरकार वे सत्ता से दूर ही रहे. ऐसा माना जाता है कि अखिलेश के गैर यादव साथी नेता भी अपनी जातिय़ों को यादवों के साथ खड़ा करने में पूरी तरह सफल नहीं हो सके. इसके कई कारण गिनाए जाते रहे हैं. सबसे बड़ा कारण यादवों की सामंती प्रवृत्ति को ही माना जाता रहा है. कई बार हल्के फुल्के अंदाज में यादवों को पिछड़ी जाति का ब्राह्मण और ठाकुर करार दिया जाता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछड़ी जातियों में यादव बिरादरी डॉमिनेटिंग कास्ट है. ठीक वैसे ही जैसे दलितों में जाटव, उसके पास पहले से खेती बाड़ी रही है और दूसरी पिछड़ी जातियों से ज्यादा संपन्नता भी. यही वजह रही कि राजनीति में भी उसका दूसरी पिछड़ी जातियों के मुकाबले ज्यादा बोलबाला रहा है.

पिछड़ी जातियों में सबसे ज्यादा संख्या यादवों की 
एक खास बात नंबर का भी है. पिछड़ी जातियों में सबसे ज्यादा संख्या यादवों की है. बाकी सभी एकमुश्त पिछड़ी जातियों की संख्या तो यादवों से ज्यादा है लेकिन कई छोटी-छोटी जातियों के होने के कारण इनकी अलग-अलग संख्या बहुत कम हो जाती है. यानी अकेले इनकी राजनीतिक ताकत लगभग शून्य ही हो जाया करती है इसीलिए ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद जैसे नेता कभी अकेले लड़कर नहीं जीते जब साथी मिले तो जीत भी मिली. यादव बिरादरी के इसी चरित्र से गैर यादव पिछड़ी जातियां खौफ खाती रही हैं. गांव-गांव में इनके बीच हमेशा दूरी रही है. गांव के संसाधनों पर यादवों का ही कब्जा रहा है.

ऐसे में गैर यादव पिछड़ी जातियों जैसे की राजभर, कश्यप, चौहान, मौर्या, शाक्य, सैनी, कुशवाहा आदि को लगता है कि यादवों के सत्ता में आने पर इनके लिए और भी मुसीबत खड़ी हो जाएगी. यही सोच यादवों के साथ गैर यादव जातियों को खड़ा नहीं होने देती. 1993 में तो सपा और बसपा साथ लड़कर भी चुनाव नहीं जीत पाये थे. तब बसपा को 67 और जनता दल को 27 सीटें मिली थीं. 2019 के लोकसभा चुनाव में भी सभी पिछड़ी जातियों को साधने के लिए सपा बसपा का गठबंधन हुआ था. इसे सत्ताधारी भाजपा के लिए डेडली कॉम्बिनेशन का नाम दिया गया था. नतीजे फुस्स हो गये. साल 2022 में भी अखिलेश का ऐसा ही प्रयोग फिर से फेल हो गया. यानी सभी पिछड़ी जातियों को एक झण्डे के नीचे खड़ा करना संभव नहीं है.

कारगर है हिंदुत्व का एजेंडा
इस असंभव कॉम्बिनेशन को साधने के लिए भाजपा लगातार प्रयासरत है. पार्टी का हिन्दुत्व एजेंडा इस मामले में सबसे ज्यादा कारगर है. ये एक ऐसा धागा है जिसके सहारे भाजपा ने एक दूसरे के खिलाफ खड़ी होने वाली जातियों को भी एक साथ एक ही दागे में पिरो दिया है. इसमें सबसे बड़ा चैलेंज यादवों को जोड़ना है. हालांकि भाजपा खुलकर कभी यादवों की सरपरस्ती करती नहीं दिखती. उसे शायद ये डर सता रहा होगा कि इससे गैर यादव पिछड़ी जातियां बिदक जाएंगी. हालांकि पार्टी क्यों नहीं चाहेगी कि यादव बिरादरी भी उसके साथ खड़ी हो जायेण् भाजपा ने न सिर्फ दिवंगत हरिमोहन सिंह यादव को अभूतपूर्व सम्मान दिया बल्कि मुलायम सिंह के करीबी नेताओं को भी पार्टी में शामिल कराया. अपर्णा यादव और हरिओम यादव को लाना पार्टी की इसी कोशिश को बता रहा है.

Tags: Lucknow news, Uttar pradesh news



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