article by parmanand verma culture– News18 Hindi

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ये अटपट, खटपट, चटपट नगरी हे, इहां चउपट नांव के राजा रहिथे जेकर नियांव अउ बेवस्था घला वइसने कस रहिथे. इहां टका सेर भाजी अउ टका सेर खाजा बिकथे. सब कुछ इहां अंधेर होवत हे. ओहर देखत, सुनत अउ जानत सब कुछ हे. कलजुग हे न. कलजुग मं अउ का होही? अब देख न, कोरोना का आइस उहू हा सब कुछ चउपट करके रख दिस. सब के कारोबार के भठ्ठा बइठार दिस, राड़ी-अनाथिन बरोबर बना के रख दिस. सत्यानास होवय ओ कलमुंहा लाकडाउन के, ओहर तो अउ आगी मूतत हे. दू तीन महिना के बाद खुलत हे तब एमा जेला पहिली खुलना रिहिस हे तेकर कोनो ठिकाना नइहे के ओहर कब खुलही अउ जेला सब ले पाछू खोलना रिहिस हे तउन पहिली खुलगे.

शराब दुकान पहली ले खुल गे तब ओहर मटमटावत हे, शापिंग के दुकान, बजार, माल, मैरिज गार्डन, पैलेस, बार सबो खुलगे फेर मंदिर, मसजिद, गिरजाघर, गुरुद्वारा दांत निपोरे देखत हें, उहां ताला लटके हे. अगोरा मं हे कब “ओपन-लाक” होही? भक्त मन छटपटावत हे अपन अपन भगवान अउ देवता के दरशन बर. ओकर ले जादा पुजारी मन के जीव सांसत मं हे. तीन महिना असन होय ले जात हे दान दक्षिना, चढ़हौतरी सब बंद हे. भगवान बर भोग ले के आवत रिहिन हे तउनो सब सटकगे हे. मालपुआ, हलवा, खीर-पुड़ी, चिरौंजी, बादाम, सिंघाड़ा, दाख, किसमिस, बैचांदी जइसन किसम-किसम के कलेवा आवय तउन सब सपना होगे.

पुजारी मन दुच्छा संझा बिहनिया पूजा करत हे. खाली हाथ मंदिर मं आरती करत घंटी हलावत हे, झालर बजावत हे अउ दू चार ठन इसलोक पढ़ के हाथ जोड़ के भगवान ला परनाम करत मुंह लटकाय खाली हाथ घर लहुट जथे. कोनो मरे रोवइया एक झन भक्त देखउन नइ देवय. ये कोरोना अइसे झांक दे हे जना-मना ओ पूजा घर नोहय जमराज के घर हे. सब इहां आय बर डर्रावत हे. अरे इही ओ जगह हे जिहां बतरकिरी असन भक्त मन झपाय परय फेर आज कोन का साँप सूंघ दे हे ते?

जब ले मंदिर, मसजिद, गिरिजाघर अउ गुरुद्वारा के पट बंद हे तब ले बने दले-मले दिखय तेन पुजारी मन के पेट ओसकगे हे. पहिली हाथी मन कस पेट दिखय तउन मन मरहा बछरू कस दिखत हे. सब समय समय के बात हे, सबो समय एक बरोबर नइ होवय. सुख-दुःख, हानि-लाभ तो जीवन मं लगे रहिथे, बने हकन के खात रिहिन मालपुआ ,हलवा, खीर-पूड़ी अउ छप्पन भोग के कलेवा. भगवान ला भोग लगाय बर आवय तउन ला गटकत रिहिन हे पुजारी मन. अब तो दार भात घला मिलना मुसकिल होगे हे, अइसन सुनब मं आवत हे.

बड़ा करलई होगे हे पुजारी मन के. भगवान ला घला देखना चाही. पुजारी मन उपर अइसन बिपत परे हे तब ओकर मन के रक्षा करे बर ओला आना चाही. नइते ओहर केहे हे- “हम भक्तन के भक्त हमारे” तउन बात हा गलत हो जाही फेर वाह रे कोरोना तैं भगवान ले घला बढ़ के होगे हस, तहूं धंधागे हस जइसे कृष्ण हा जेल मं धंधागे रिहिस. फेर ओहर चालाकी चल के कंस ला चकमा दे दिस अउ जमुना पार करके गोकुल आगे.

पूजा तो भगवान मन के होवत हे, संझा-बिहनिया आरती, शंख, झालर, घड़ियाल बजत हे, भोग लगत हे. ओला का के चिंता फेर चिंता तो बपरा पुजारी मन ला हे. ओकर मन के घर परिवार के हालत खराब हे. भगवन घला आंखी मूंद के बइठगे हे. सब कोती के लाकडाउन हे तउन खुलत जात हे. शराब दूकान खुलगे, बाजार हाट खुलगे, शापिंग माँल, बार, क्लब, गार्डन सबो खुलगे फेर मंदिर, मसजिद, गिरजाघर, गुरुद्वारा हा कोन से अइसे पाप कर डरे हे अपराध कर डरे हे ते एकर मन के पट खुले के नांव नइ लेवत हे.

धरम-करम, दान-पुण्य, पूजा-पाठ, यज्ञ अउ हवन नइ होही तब समाज मं सुख शांति कइसे आही? जब जब अइसने धरम के हानि होही तब तब पाप बढ़थे, दुःख अशांति बढ़थे, महामारी बढ़थे अइसन लोगन मन कहिथे. समाज मं करलेस अउ हाहाकार मचथे. ये कोरोना का हे, ए सब अधरम अउ पाप के फल हे जउन ला समाज अउ सरकार हा भोगत हे. आजो उही अधरम अउ अनियांव के मारग मं चलत हौ, मदिरालय ला खोल देव फेर मंदिर, मसजिद बर का के अड़ंगा आगे हे?

पहिली पूजा के घर के पट ला खोले ले छोड़ के शराब माल, बार अउ क्लब के पट ला खोले के मंजूरी देके धरम के पट ला बंद राखिहौ तब अइसने कांटा गड़त रइही, समाज अउ सरकार के पाँव मं, महामारी घेरी बेरी आवत रइही. धन-जन के अइसने बिनास होवत रइही जइसे अभी अपन आंखी ले बट-बट ले देखे हें. कतको जतन करिहौ फेर छटपटाथे रइहौ. अभी ऑक्सीजन के सिलेंडर अउ वैक्सीन बर कतेक छटपटाय ले परिस हे, अधरम के रसदा मं चले ले अइसने गति होथे.

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