Bijapur Encounter: नक्सली आतंक खत्म करने पर बयान नहीं, कुछ ठोस करिए सरकार!

0
13


मुठभेड़ में गोली लगने से एक इनामी बदमाश घायल हुआ है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

Naxalite Attack In Chhattisgarh: नक्सलियों के खात्मे के लिए रणनीति पर मंथन के पहले और बाद में गृह मंत्री अमित शाह और सीएम भूपेश बघेल के बयान आए, लेकिन जनता ठोस कार्रवाई चाहती है. वास्तव में नक्सली खत्म करने हैं तो उनकी हथियारों की रसद और उगाही के रास्ते बंद करने होंगे.

रायपुर. छत्तीसगढ़ के बीजापुर और सुकमा जिले के बॉर्डर पर नक्सली हमले में 24 जवानों की शहादत से हड़कंप मच गया है. इस साल के सबसे बड़े और दस दिन के भीतर दूसरे बड़े नक्सली हमले की गूंज इस बार दिल्ली दरबार तक सुनाई दी. गृह मंत्री अमित शाह को असम में अपना चुनावी दौरा रद्द कर छत्तीसगढ़ का रुख करना पड़ा और असम में कांग्रेस को चुनाव जितवाने की जिम्मेदारी लेकर करीब दो माह से डेरा डाले बैठे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को वापस लौटना पड़ा. एसटीएफ, पुलिस, सीआरपीएफ, नक्सली ऑपरेशन में लगे अफसरों के संग बैठ कर रणनीति पर मंथन करना पड़ा. ऐसी रणनीतियां 2010 में नक्सली हमले में 76 लोगों की शहादत और कई बड़े हमलों के बाद भी बनी थीं. पहले की तमाम रणनीतियां फेल होते तो सबने देखा है, लेकिन इस बार क्या तय हुआ, यह सामने आना बाकी है. अलबत्ता मीटिंग के पहले और बाद में गृह मंत्री अमित शाह और सीएम भूपेश बघेल के सामने आए बयान पहले जैसे थे. शाह बोले-‘हम जड़ से नक्सलवाद को खत्म करेंगे. उनके खिलाफ लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर है.’ सीएम भूपेश बघेल बोले, ‘हम नक्सलियों को उनके गढ़ में घुसकर मार रहे हैं, यह नक्सलियों की आखिरी लड़ाई है.’ जनता के सामने 24 जवानों की शहादत और 30 से ज्यादा जवानों के घायल होने की खबरें और तस्वीरें सामने आई हैं. मुठभेड़ और नक्सलियों के हताहत होने के दावों के लेकर सिर्फ कयासों पर आधारित अफसरों के बयान ही देखने-सुनने को मिले हैं. सियासी बयानबाजी वक्ती तौर पर जवानों और सुरक्षा बलों का हौसला बढ़ाने और जनता में भरोसा जगाने और अपनी नाकामी को छिपाने की कोशिश का हिस्सा तो हो सकती है, लेकिन जनता के कान ऐसे बयानों को सुनते-सुनते पक चुके हैं. वास्तव में कुछ ठोस करना होगा.

Youtube Video

10 दिन के भीतर दूसरा बड़ा हमला

आगे पढ़ें

सरकार कोई बड़ा एक्शन लेने वाली है

जिस तरह से आनन-फानन बैठकों और रणनीतियों पर मंथन का दौर चला, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि राज्य और केन्द्र सरकार आतंक का खूनी खेल खेल रहे नक्सलियों के खिलाफ कोई बड़ा एक्शन लेने वाले हैं. बता दें कि छत्तीसगढ़ 1980 यानी 4 दशक से नक्सली समस्या से जूझ रहा है. इसी साल बीजापुर के रास्ते से नक्सली छत्तीसगढ़ में घुसे थे. 2005 में नक्सलियों को अलग-थलग करने के लिए राज्य की रमन सिंह सरकार ने सलवा जुडुम अभियान शुरू किया, लेकिन इसके बाद 2006 से छत्तीसगढ़ में बड़े पैमाने पर नक्सली आतंक ने पैर पसार लिए. 2010 में भी सुकमा में नक्सली हमले में 76 लोगों की शहादत और उसके बाद 25 मई 2013 को झीरम घाटी में हुए नक्सली हमले में विद्याचरण शुक्ल, नंद कुमार पटेल, महेन्द्र कर्मा समेत कांग्रेस के अधिकांश आला नेताओं की मौत के बाद भी ऐसी रणनीतियां बनाई गई थीं. संयुक्त नक्सली ऑपरेशन के लिए समन्वय समितियां भी बनी थीं. नक्सली खौफ खत्म करने के लिए नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सड़कें बनाने, रोजगार के रास्ते खोलने और अधोसंरचना विकास के काम कर आदिवासियों का भरोसा जीतने की तमाम योजनाएं बनीं, लेकिन सब वक्त और सरकारें बदलने के साथ नाकाम होती चली गईं. नक्सलवाद के खात्मे के लिए राजनीतिक मतैक्यता और इच्छाशक्ति का भी घोर अभाव देखने को मिला.

सरकार कोई बड़ा एक्शन लेने वाली है

आगे पढ़ें

हथियारों की रसद और आर्थिक कमर तोड़नी होगी

बता दें कि बीजापुर में डीआरजी, एसटीएफ, सीएफआरपीएफ के जवान शहीद हुए हैं. इस हमले में नक्सलियों ने यूएनजीएल, राकेटलांचर, एके-47, इंसास रायफलों जैसे हथियारों का जमकर इस्तेमाल हुआ. मीडिया और सियासत में जो लोग यह बात बहुत ही आसानी से कह देते हैं कि ‘चीन की गन और धन’ से माओवादी अपने ही देश भारत में खूनी खेल रहे हैं, ऐसा कहने वालों से एक सवाल है कि इनको भारत में आने देने के लिए सरकार, सिस्टम और सियासत क्या जिम्मेदार नहीं है? सरकार क्यों इतने सालों में इन नक्सलियों की आर्थिक कमर नहीं तोड़ सकी? क्यों नक्सलियों की उगाही के रास्ते सरकार बंद नहीं कर पा रही? 300 से 500 करोड़ के बीच की सालाना उगाही ये नक्सली कहां से करते हैं, यह छत्तीसगढ़ के हर नेता और अफसर को पता है. क्यों अभी तक सरकारें यह पता नहीं लगा सकी हैं कि नक्सलियों को गोला-बारूद, विस्फोटक, मशीनगन्स, रॉकेट लांचर कहां से मिल रहे हैं? क्या ये सवाल सरकारों से नहीं पूछा जाना चाहिए कि पंजाब हो या कश्मीर वहां आतंक का खेल खत्म करने का दावा करते हुए सफलता का सेहरा बांध लिया जाता है, लेकिन नक्सली आतंक को खत्म करने में वह क्यों नाकामयाब है?

हथियारों की रसद और आर्थिक कमर तोड़नी होगी

आगे पढ़ें

नक्सलियों के आगे सिस्टम क्यों लाचार

बीजापुर में हालिया नक्सली हमले के घटनाक्रम को देखें तो इसमें सिस्टम कितना अनट्रेंड और लाचार है, इसका अंदाजा सीआरपीएफ के डीजी कुलदीप सिंह के एक बयान से लगाया जा सकता है. वह कहते हैं कि नक्सलियों ने अपनी रणनीति बदल ली है, हम उनकी रणनीति को समझेंगे और फिर अपने जवानों को उनके हिसाब से प्रशिक्षित करेंगे. उनकी एक बात तो ठीक लगती है कि किसी भी घटना से सीखा जा सकता है, लेकिन यह बात सवाल खड़े करती है कि क्या अनपढ़, आदिवासी नक्सली सुरक्षा महकमों और खांचे में बंधे खुफिया तंत्र से ज्यादा होशियार है, जो रणनीतियां बदल लेता है, लेकिन तंत्र मुकाबले के लिए अपनी नई रणनीति बनाने की बजाय घिसे-पिटे फार्मूले पर चलता है? हमले में जिस मास्टर माइंड नक्सली हिड़मा का नाम आ रहा है, उसके बारे में खबरें हैं कि वह अनपढ़ है, लेकिन गोरिल्ला वार की योजना बनाने में उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता. क्या हमारे संसाधनों से लैस सिस्टम में काम कर रहे अफसरों में हिड़मा जैसी रणनीतिक चपलता का अभाव है. वास्तव में अगर ऐसा है तो ऐसे अफसरों की नियुक्त करने के बारे में सरकारों और जिम्मेदारों को सोचना चाहिए.

नक्सलियों के आगे सिस्टम क्यों लाचार

आगे पढ़ें

विरोधाभासी बयान कहां ले जाएंगे

डीजी नक्सल ऑपरेशन अशोक जुनेजा कहते हैं कि एक दिन पहले तर्रेम इलाके के सिलगेर के जंगल में नक्सली हमले में 8 जवान शहीद हो गए थे, उन्हीं के रेस्क्यू के लिए गए जवानों का दल लौटते समय नक्सलियों के एम्बुश में घिर गया. दूसरी तरह सीएम भूपेश बघेल के बयान पर गौर कीजिए, जो मीडिया से कहते हैं कि लौटते समय नहीं, बल्कि नक्सलियों के गढ़ में आगे बढ़कर घुसते हुए मुठभेड़ करते हुए जवान शहीद हुए हैं. हम नक्सलियों के गढ़ में घुस कर मार रहे हैं. राज्य सरकार केन्द्र के साथ मिलकर नक्सलियों के खिलाफ अभियान और तेज करेगी. बयानों में विरोधाभास बताता है कि सब हवा में बिना लक्ष्य तीरदांजी करने जैसा मामला लगता है. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)

विरोधाभासी बयान कहां ले जाएंगे

आगे पढ़ें

<!–

–>
<!–

–>




Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here