Explained: जब भारत में लगभग खत्म हो गए थे कोरोना केस, तो फिर क्यों बढ़े?

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कोरोना के बढ़ते मामले एक फिर बार फिर आम लोगों समेत सरकार को डरा रहे हैं. बीते 24 घंटे में 96,563 नए मरीज आए. इससे एक रोज पहले मामले एक लाख क्रॉस कर चुके थे, जिसे कोरोना काल में देश का सबसे बड़ा आंकड़ा माना गया. इससे पहले पिछले साल सितंबर के महीने में 97 हजार से ज्यादा नए मामले सामने आए थे. यही देखते हुए ये बात उठ रही है कि बीते साल सितंबर के बाद जबकि मामले घट चुके थे, तब दोबारा इसमें पीक क्यों दिख रहा है.

कोरोना की दूसरी लहर के दौरान संक्रमण तो वाकई में तेजी से बढ़े लेकिन मौत की दर में वैसी बढ़त नहीं थी, जिससे लोग निश्चिंत थे लेकिन अब बीते 4 हफ्तों में मृत्यु दर भी बढ़ी. टाइम्स ऑफ इंडिया में इस बारे में एक रिपोर्ट आई है, जिसमें बताया गया कि कैसे संक्रमण के साथ ही फैटेलिटी भी बढ़ रही है. 8 मार्च से कोविड से संबंधित मौतों संक्रमण के साथ ही तुलनात्मक तौर पर बढ़ीं.

इस पीरियड के दौरान संक्रमण के दैनिक मामले (सात दिनों का औसत) और मौत की दर में लगभग 345% की बढ़ दिखी. वहीं 8 फरवरी से 8 मार्च के बीच दैनिक औसत में 50% की बढ़त हुई लेकिन मौत के आंकड़ों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं दिखी थी. यानी ताजा ट्रेंड परेशान करने वाला है.

भीड़ दूरी का पालन नहीं कर पा रही और लोग पास-पास ही खड़े हैं (Photo- news18 English via AP)

हम एक बार फिर उसी सवाल पर लौटते हैं कि इन महीनों में ऐसा क्या बदला जो मामले इस कदर बढ़े. बिगड़ते हालात को देखते हुए केंद्र सरकार ने 4 अप्रैल को एक उच्चस्तरीय बैठक में इस बारे में चर्चा की. इसमें तीन बातें निकलकर आईं, जिन्हें कोरोना ग्राफ बढ़ने के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है.

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पहला कारण है कोविड-एप्रोप्रिएट बिहेवियर (Covid-appropriate behaviour) की कमी. इसका अर्थ है बार-बार कुछ समय के अंतराल पर हाथ धोना, दो गज की दूरी बनाए रखना और मास्क पहनना. लेकिन लोगों को ये लगने लगा है कि इतना कुछ करने की जरूरत नहीं. और वे यही कर रहे हैं. बाजारों, शॉपिंग मॉल और रेस्त्रां में भीड़ है. यहां तक कि पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार रैलियों में भारी संख्या में लोग आ रहे हैं, जिनमें कम ही लोग मास्क में दिखते हैं. भीड़ दूरी का पालन नहीं कर पा रही और लोग पास-पास ही खड़े हैं.

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इससे पहले होली मिलन भी खूब धूमधाम से हुआ और नेता भी ऐसे आयोजनों में शामिल दिखे. हरिद्वार का कुंभ मेला भी पहले उतना सख्त नहीं था और बगैर कोविड टेस्ट कराए लोग आ-जा रहे थे. यहां हर जगह कोविड-एप्रोप्रिएट बिहेवियर की कमी साफ दिखी.

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हर जगह कोविड-एप्रोप्रिएट बिहेवियर की कमी साफ दिख रही है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

संक्रमण बढ़ने की दूसरी वजह है पेन्डेमिक फटीग (pandemic fatigue). इसका अर्थ ये है कि लोग लंबी चलने वाली महामारी से इतना थक जाते हैं कि वे उससे बचाव के तरीकों को भूलकर अलग तरह से यानी सामान्य ढंग से जीना शुरू कर दें. इस फटीग में कई बातें आती हैं, जैसे लोग चिड़चिड़े हो जाते हैं, नींद नहीं आती, काम से मन हट जाता है. इससे होता ये है कि वे खुद को सुरक्षित रखने की कोशिश छोड़ देते है और महामारी की चपेट में आने की आशंका बढ़ जाती है.

कोरोना का ग्राफ ऊपर जाने का एक कारण स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक लापरवाही भी है. महामारी की शुरुआत में हमने दूसरे देशों से प्रेरणा लेकर एक क्लीयर तरीका बनाया था, जिससे संक्रमण को पकड़ा और सभी संदेहास्पद लोगों को निगरानी में रखा जा सकता था. कॉन्टैक्स ट्रेसिंग शब्द तक खूब चला था. लोग खुद भी डरे होने के कारण अपने स्वास्थ्य की सही जानकारी देने लगे थे. अब ये खत्म हो रहा है. जांचों की संख्या और बढ़ाए जाने की जरूरत बताई जा रही है लेकिन संक्रमण के लिहाज से ये कम ही है.

मामले बढ़ने की एक और वजह विशेषज्ञ खुद ही दे रहे हैं. वे मानते हैं कि देश में कोरोना वायरस का डबल म्यूटेंट भी मिल रहा है. ये ज्यादा आसानी से वायरल लोड बढ़ा देता है, जिससे संक्रमण के एक से दूसरे में जाने की आशंका बढ़ जाती है. देश में कई विदेशी वेरिएंट भी मिल चुके हैं, जैसे यूके वेरिएंट, जिससे बारे में साफ हो चुका है कि वो कई गुना तेजी से फैलता है.

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देश में कोरोना वायरस का डबल म्यूटेंट भी मिल रहा है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

इसके अलावा वायरस के रिप्रोडक्शन की दर, जिसे R नंबर कहते हैं, उसमें भी इजाफा हुआ है, जो संक्रमण में बढ़त का कारण है. बीबीसी की एक रिपोर्ट में इसका जिक्र है. वहां क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर के एक विशेषज्ञ के हवाले से बताया गया कि पहली लहर में R नंबर 2 से 3 के बीच था. लेकिन दूसरी लहर में ये 3 से 4 के बीच हो गया है. इससे इस लहर के दौरान मामले तेजी से बढ़े.

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एक बड़ी समस्या वैक्सिनेशन की धीमी रफ्तार भी है. आबादी की तुलना में टीकाकरण में और तेजी की जरूरत है. वहीं लोगों को मोटिवेट करने की जरूरत भी है कि वे टीका लें. विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना की लहर को कंट्रोल करने के लिए वैक्सिनेशन प्रक्रिया को अनलॉक कर दिया जाना चाहिए. विशेषकर उन राज्यों में हर आयुवर्ग के टीकाकरण शुरू हो जाए, जहां मामले कई गुना तेजी से बढ़े हैं. इसपर चर्चा हो भी रही है. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है कि क्या हमारे पास इतनी सप्लाई है कि अनलॉक करने पर सबको टीका मिल सकेगा. इसका दूसरा पहलू भी है कि टीकाकरण सबके लिए खोल देने पर कहीं ये न हो कि जरूरतमंद लोग पीछे हो जाएं और बाकी लोग उनकी जगह पहले आ जाएं. इससे भी संक्रमण बना रहेगा.





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