EXPLAINER CM Nitish kumar furious over change name of Bakhtiyarpur brvj

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पटना. देश की राजनीति को जानने-समझने वाले सियासी जानकार अक्सर दावा करते हैं कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) की राजनीति का अहम हिस्सा धार्मिक ध्रुवीकरण (Religious Polarization) है. इसके बूते वह कई चुनाव जीत चुकी है. इसी क्रम में उनकी सत्ता जहां भी आती है शहरों का नाम बदलने की सियासत भी करती रही है. उत्तर प्रदेश में फैजाबाद को अयोध्या (Faizabad to Ayodhya) किया जाना हो या फिर इलाहाबाद को प्रयागराज (Allahabad to Prayagraj) बनाना हो. इसी तरह अब अलीगढ़ को हरिगढ़ में बदलने की बात हो रही है. वहीं बिहार में बख्तियारपुर का नाम बदलने की मांग भी बहुत पुरानी है. खास तौर पर भाजपा के नेताओं और हिंदूवादी संगठनों द्वारा इसे ‘कलंक’ बताते हुए मिटाने के लिए नाम बदलने की वकालत करते रहते हैं. हालांकि यह बात सीएम नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) को बिल्कुल ही पसंद नहीं है.

भाजपा नेता हरिभूषण ठाकुर के इस मांग को कि बख्तियारपुर का नाम बदलकर नीतीश नगर कर दिया जाए, पर सीएम नीतीश कुमार ने मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए दो टूक शब्दों में कह दिया कि क्या बात करते हैं, नाम काहे (क्यों) बदलेगा? मेरे जन्म स्थान का नाम बख्तियारपुर है, उसका नाम क्यों बदलेगा? लोग बख्तियारपुर के बारे में बिना मतलब की बात करते हैं. ये सब फालतू बात है!

CM के गुस्सा होने के सियासी मायने
जाहिर है कई लोग नीतीश की इस बात को शहरों और जगहों के नाम बदलने की सियासी परंपरा के विरुद्ध सीएम नीतीश कुमार की नापसंदगी से जोड़कर देखते हैं. लेकिन सियासत के जानकार इसके पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी वजह मानते हैं. राजनीति के जानकारों की नजर से ये दोनों ही वजहें  उनकी कही गई बा तों से ही स्पष्ट भी हो जाती हैं. दरअसल पहले सीएम नीतीश का गुस्सा होना, फिर मुस्कुराते हुए यह कहना है कि मेरा जन्मस्थान बख्तियारपुर है! सीएम के इस अंदाज के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं.

खुद की पहचान इस रूप में चाहते हैं नीतीश!
इसके साथ ही सीएम नीतीश की रणनीति को आगे के उनके वक्तव्यों के जरिये सियासी जानकार आकलन करते हैं. दरअसल सीएम नीतीश ने इसी बातचीत के क्रम में कहा कि यहीं (बख्तियारपुर) के एक व्यक्ति ने नालंदा विश्वविद्यालय को नए सिरे से बनाना शुरू कर दिया है. हम बख्तियारपुर का नाम क्यों बदलेंगे? इस जगह को लेकर लोग बिना मतलब की बात कर रहे हैं. नाम नहीं बदला जाएगा. इसके पीछे की वजह बताते हुए वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि सीएम नीतीश खुद को इतिहास पुरुष के तौर पर स्थापित करना पसंद करते हैं. ऐसे में बख्तियार खिलजी के नालंदा विश्विविद्यालय के विध्वंसक के तौर पर इतिहास में नाम दर्ज है तो नीतीश इसके पुनर्निर्माणकर्ता के तौर पर स्थापित होते हुए देखना चाहते हैं.

नीतीश कुमार ने तब भी यही कहा था…
यह बात सीएम नीतीश ने तब भी कहा था जब 1 मई 2019 को नालंदा खुला विश्वविद्यालय के भवन निर्माण का शिलान्यास हुआ था. तब सीएम नीतीश ने कहा था कि नालंदा प्राचीन काल से ही शिक्षा के केंद्र के रूप में जाना जाता रहा है. इसके गौरव को फिर से लौटाना है. सीएम नीतीश ने आगे कहा, माना जाता है कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को बख्तियार खिलजी ने नष्ट किया था. इसके लिए उसने बख्तियारपुर में डेरा डाला था. वहीं से रहकर उसने इस अदभुत शिक्षा के केंद्र को नष्ट कर दिया.

इस मामले में याद किए जाते रहेंगे नीतीश!
सीएम नीतीश ने आगे कहा कि आप सभी जानते हैं कि मेरे पिता वैद्य थे और बख्तियारपुर में ही रहते थे. मेरा जन्म भी वहीं हुआ है. आज मैं गर्व से कह रहा हूं कि एक बार बख्तियार खिलजी ने इसका विनाश किया था और मैं उसी बख्तियारपुर का रहने वाला इसके उत्थान में लगा हूं. मैंने इसे फिर से स्थापित करने का संकल्प लिया है. राजनीतिक जानकार साफ तौर पर सीएम नीतीश कुमार के इस वक्त्व्य का यह अर्थ भी निकालते हैं कि कहीं न कहीं वे इतिहास पुरुष के रूप में भी स्वयं को साबित करने की इच्छा रखते हैं. ऐसे में नालंदा विश्विविद्यालय के पुनर्निर्माण के साथ नीतीश कुमार विध्वंसक बख्तियार खिलजी के साथ ही म याद किया जाएगा.

नीतीश के लिए खुले रहेंगे राजनीतिक विकल्प
बिहार और सीएम नीतीश कुमार की सियासत को जानने-समझने वाले पत्रकार रवि उपाध्याय इसको एक अलग कोण से भी देखते हैं. वह सीएम नीतीश के बख्तियारपुर का नाम नहीं बदले जाने के पीछे उनके सियासी विकल्प के जीवित रखने और मुस्लिम एंगल की भी बात कहते हैं. बकौल रवि उपाध्याय सीएम नीतीश को पता है कि आने वाले समय में अगर थर्ड फ्रंट की राजनीति कहीं आगे बढ़ती है तो नीतीश इसका विकल्प हो सकते हैं. ऐसे में खुद का सेक्यूलर चेहरा बचाए रखना भी बहुत जरूरी है.

मुस्लिमों का पूरा साथ नहीं मिल पाया
इसी के साथ ही रवि उपाध्याय यह भी कहते हैं कि इसमें एक वोट बैंक का भी एंगल है. दरअसल काफी लंबे समय से मुस्लिम वोटरों को अपने साथ लाने की जुगत में सीएम नीतीश जी तोड़ मेहनत कर चुके हैं. थोड़ा बहुत उन्होंने लालू यादव के इस मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाई भी, लेकिन लालू वाला स्थान मुस्लिमों के बीच नहीं बना पाए. लेकिन, उनकी इच्छा हमेशा रही है कि मुस्लिम उनके साथ जुड़ें. अब राजनीति की मजबूरी है जो भाजपा के साथ होने की वजह से मुस्लिमों का उतना साथ उनको नहीं मिल पाया है.

बख्तियार खिलजी का नाम अभी चलता रहेगा
रवि उपाध्याय कहते हैं कि संयोग ही है कि बीते विधानसभा चुनाव में जदयू से एक भी मुस्लिम विधायक नहीं बन पाया. ऐसे में बीएसपी के जमा खान को जदयू में लाकर उन्होंने खुद को मुस्लिमों का रहनुमा साबित करने की फिर कोशिश की. अब बात बख्तियार खिलजी की उठी है तो भला सियासत के मास्टर खिलाड़ी भला बख्तियार खिलजी विवाद को अपने पाले में मोड़ने से कैसे चूक सकते हैं. सीएम नीतीश किसी भी सूरत में अपनी सेक्यूलर छवि को बिगड़ने नहीं देना चाहते हैं, वहीं भाजपा भी अपने कोर मुद्दे से पीछे नहीं हटने वाली. ऐसे में बख्तियार खिलजी का नाम सियासी तौर पर अभी चलता रहेगा.

भाजपा-नीतीश की रणनीति का अहम किरदार
बता दें कि भाजपा विधायक हरि भूषण ठाकुर बचोल ने बख्तियारपुर का नाम बदलकर नीतीश नगर रखने की मांग की थी. दो साल पहले भी भाजपा के सांसद गोपाल नारायण सिंह ने राज्यसभा में बख्तियारपुर स्टेशन का नाम बदलने की मांग उठाई थी. भाजपा के वरिष्ठ नेता अश्विनी उपाध्याय ने इस बाबात तत्कालीन रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा से बख्तियारपुर जंक्शन का नाम बदलने की अपील भी की थी. सबसे खास बात यह है कि स्थानीय लोगों की भी यही इच्छा है कि बख्तियारपुर का नाम उन्हें ठीक नहीं लगता. एक तरफ जहां यह मुद्दा एक पक्ष के सेंटिमेंट को छूता है, वहीं दूसरा पक्ष भी इससे प्रभावित होता है. ऐसे में नीतीश कुमार और भाजपा नेताओं की अपनी-अपनी राजनीति है जिसमें बख्तियारपुर भी एक मुद्दा है और आगे भी रहेगा.

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