Hazratganj History: हजरत से कैसे बना ‘हजरतगंज’, जानें लखनऊ की धड़कन का इतिहास

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लखनऊ. एक ऐसा बादशाह जिसने लखनऊ की धड़कन कहे जाने वाले हजरतगंज को बसाया था. उसे लोग हजरत कहते थे, इसीलिए हजरतगंज का नाम उसी के नाम पर रखा गया. नवाब अमजद अली शाह का मकबरा हजरतगंज में ही स्थित है. अमजद अली शाह का मकबरा 1847 से लेकर 1856 के बीच में उनके बेटे और अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह ने बनवाया था. लखनऊ के इतिहासकार डॉ. रवि भट्ट के मुताबिक, 17 फरवरी 1847 को पीठ में फोड़े की वजह से अमजद अली शाह का इंतकाल हो गया था. इसके बाद उनके बेटे वाजिद अली शाह ने उनको इसी मकबरे में दफनाया था.

प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. रवि भट्ट ने बताया, ‘कुछ इतिहासकार यह भी कहते हैं कि नवाब अमजद अली शाह ने मरने के पहले ही कब्र के रूप में बनाने का आदेश दे दिया था. जबकि वाजिद अली शाह ने इस मकबरे को 10 लाख रुपए की लागत से बनाया था.इसमें अमजद अली शाह के साथ उनके दूसरे बेटे जावेद और बेगम भी दफन हैं. यह मकबरा बेहद खूबसूरत है और अंदर कई बड़े हॉल हैं.’ साथ ही उन्‍होंने बताया कि यहां पर मोहर्रम का मातम मनाया जाता है. इस मकबरे के बारे में कहा जाता है कि मर्सिया पढ़ने वाले मशहूर मीर अनीस और मिर्जा दबीर ने यहां पर वाजिद अली शाह के पहली बार आमंत्रण पर एक दूसरे के साथ मर्सिया पढ़ा था. जबकि दोनों एक दूसरे की शक्ल भी देखना पसंद नहीं करते थे.

चर्च के रूप में भी हो चुका है इस्तेमाल
अवध पर कब्जे के बाद अंग्रेजों ने इस मकबरे का इस्तेमाल चर्च के रूप में भी किया है. इस पूरे मकबरे को लखौरी ईंटों से बनाया गया है. यह पूरा मकबरा दो प्रवेश द्वार से घिरा हुआ है. इसमें बनी फूल पत्तियों की आकृति लोगों को बहुत आकर्षित करती है. इसे देखना घूमना नि:शुल्क है. हालांकि कम लोग ही यहां पर आते हैं. वर्तमान में यहां पर पुरातत्व विभाग की ओर से दिव्यांगों के लिए एक रैंप बनाया जा रहा है, ताकि वे आसानी से आ सकें. इसके अलावा इसकी मरम्मत का कार्य कराया जा रहा है.

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FIRST PUBLISHED : November 23, 2022, 17:41 IST



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