Irrfan Khan last words Amma I lost as he breathed his last ps । ‘अम्‍मा मैं हार गया’ इरफान का आखिरी संवाद | – News in Hindi

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इरफान (Irrfan Khan) के परिवार के माध्‍यम से छनकर आईं मीडिया रिपोर्ट की मानें तो कहा जा सकता है इरफान का आखिरी संवाद अपनी मां को संबोधित था, उन्‍होंने कहा था – ‘अम्‍मा मैं हार गया’ 29 अप्रैल 2020 की उस बेरहम तारीख को मुंबई के एक नामी अस्‍पताल में जब उन्‍होंने अपनी अंतिम सांसें (Irrfan Khan Death Anniversary) लीं, तब उनका बेटा बाबिल और उनकी पत्‍नी सुतापा सहित पूरा परिवार उनके साथ था. चार दिन पहले उनकी मां का साया उनसे छिना था. लाकडाउन के कारण वे उनके अंतिम संस्‍कार में भाग नहीं ले पाए थे. शायद ये दुख उन्‍हें अंदर ही अंदर साल रहा था. अपने अंतिम समय वे अपनी मां को याद कर रहे थे. परिवार के सूत्रों की मानें तो उन्‍होंने अंतिम समय में कहा था कि ‘मां मुझे लेने आई है, मुझसे बात कर रही है.’

मौत के आगोश में समाने की तात्‍कालिक वज़ह तो कोलन इंफेक्‍शन थी, लेकिन इरफान की उम्र तभी सी‍मित हो गई थी जब मार्च 2018 में न्‍यूरो इंडो क्राइन ट्यूमर जैसी घातक और दुर्लभ बीमारी ने उनके पेट में अपना घर बना लिया था. न्‍यूरो इंडो क्राइन ट्यूमर (कार्सीनोमा) केंसर की एक दुर्लभ बीमारी है और जो हद से ज्‍यादा पीड़ादायक है. दूसरे केंसर के मुकाबले बहुत तेजी से ग्रो करती है. मरीज को पता चले त‍ब तक वो जानलेवा मुकाम तक पहुंच जाती है.

जिंदगी भी अजब खेल खेलती है. क्रिकेट से बेइंतिहा प्‍यार करने वाले किसी शख्‍स को रहने के लिए ऐसी जगह मिल जाए जिस कमरे की बॉलकनी से क्रिकेट का मक्‍का कहे जाने वाले लार्ड् स के मैदान का गेट दिखता हो और सामने अपने पसंदीदा खिलाड़ी विवियन रिचर्ड का मुस्‍कुराता चेहरा. क्रिकेट लवर के लिए इससे बड़ा तोहफा क्‍या हो सकता है लेकिन स्थितियां बेमज़ा तब हो जाती हैं जब यह कमरा किसी अस्‍पताल का हो और आप एक बेहद पीड़ादायक दुर्लभ बीमारी की गिरफ्त में हो. इरफान के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ.

अपने बेटे को लिखे खत में वे कहते हैं –

‘मैं जिस अस्‍पताल में भर्ती हूं, उसमें बालकनी भी है. बाहर का नज़ारा दिखता है. वहीं सड़क के एक तरफ मेरा अस्‍पताल है और दूसरी ओर लार्डस स्‍टेडियम है. सामने पोस्‍टर पर विवियन रिचर्ड्स का मुस्‍कुराता चेहरा है.’ इरफान कहते हैं ‘ मुझे क्रिकेट बहुत पसंद है लार्ड्स भी, लेकिन मुझे इतना दर्द हो रहा है कि मैं ना तो लार्ड्स को एंजॉय कर पा रहा हूं और ना ही रिचर्ड्स की मुस्‍कुराती तस्‍वीर को.’ इससे बड़ी बेबसी और क्‍या हो सकती है.’

आंखों से संवाद करने वाले इरफान को उनके नेचरल अभिनय के लिए याद किया जाता रहा है, किया जाता रहेगा. अपने तीस साला फिल्‍मी सफर में उन्‍होंने पचास से ज्‍यादा फिल्‍में कीं. वेरायटी में रोल किए और दर्शकों और समीक्षकों को मजबूर किया वे उन्‍हें वर्सटाईल अभिनेता की श्रेणी में रखें. वे हमेशा बेहतर फिल्‍मों के मजबूत पक्षधर रहे. जिंदगी का फलसफा हो या इंडियन ऑडियंस की समझ, उनके फंडे हर मामले में क्रिस्‍टल क्लियर थे. इरफान का मानना था कि भारतीय दर्शक क्‍वालिटी फिल्‍मों को पसंद करती है. इस बारे में फिल्‍ममेकर्स पर व्‍यंग्‍य करते हुए उन्‍होंने कहा था कि ‘ऐसा किसी इंडस्‍ट्री में नहीं होता कि माल खरीदने वाला तो तैयार है लेकिन माल ही नहीं है.’

बात जि़ंदगी के फलसफे की- खाकसार की उनसे एक छोटी सी मुलाकात हुई है. जब वो शेक्‍सपियर के नाटक मेकबेथ पर आधारित फिल्‍म मकबूल की शूटिंग के लिए भोपाल आए थे. मुलाकात होने पर मैंने उन्‍हें अपना परिचय दिया. उन्‍होंने आंखें मूंदी और मेरा नाम दोहराया. मैंने उनसे पूछा आपने ऐसा क्‍यों किया आपने ? वो बोले ये एक प्रोसेस है किसी का नाम याद रखने की. इस तरह मेरे ज़ेहन में आपका नाम फीड हो गया है.इरफान का फिल्‍मी करियर काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा है. एनएसडी से स्‍नातक होकर जब वो मुंबई नगरी पहुंचे तो सपनों को सच करने वाली इस मायानगरी ने इरफान को कोई भाव नहीं दिया. वैसे इरफान कहते हैं मैं मुंबई खुद नहीं आया, मुझे बुलाया गया. बहरहाल, यहां आकर उन्‍होंने पहले सीरियल किए, चाणक्‍य, जय हनुमान आदि. मीरा नायर की सलाम बॉम्‍बे उनकी पहली फिल्‍म थी जिसमें उनका छोटा सा रोल था, फाइनल कट में वो और छोटा होकर महत्‍वहीन हो गया. हासिल इरफान की वो फिल्‍म थी जिसके बाद उन्‍हें फिल्‍म इंडस्‍ट्री में नोटिस किया गया. किया. तिग्‍मांशू धूलिया लिखित-निर्देशित इस फिल्‍म में उन्‍होंने विलेन का दमदार रोल किया. जिसके लिए उन्‍हें बेस्‍ट निगेटिव रोल के लिए पहला फिल्‍म फेयर अवार्ड भी मिला. दूसरा अवार्ड उन्‍हें फिल्‍म ए लाइफ इन मेट्रो में निभाए सहायक अभिनेता के रोल के‍ लिए मिला.

पान सिंह तोमर ये उनकी वो फिल्‍म थी जिसने उन्‍हें दमदार अभिनेता की बहुत ऊंची पायदान पर पहुंचा दिया. ये अलग बात है कि वो पहले ही इसे साबित कर चुके थे. इसके लिए उन्‍हें अभिनय का राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार भी मिला. हैदर, गुंडे, पीकू, तलवार, लंच बॉक्‍स सहित अनेक खूबसूरत फिल्‍में उन्होंने की हैं. 2017 में आई हिंदी मीडियम और बीमारी के बाद की अंग्रेजी मीडियम उनकी बेहतर फिल्‍मों में शामिल की जाती हैं.

इरफान बॉलीवुड तक सीमित नहीं रहे बल्कि उन्‍होंने अपनी प्रतिभा का डंका पूरी दुनिया में बजाया. इंटरनेशनल फिल्‍मों की बात करें तो इसकी शुरूआत 2001 में द वारियर से हुई. बाद में उन्‍होंने द नेमसेक, द दार्जिलिंग लिमिटेड, स्‍लमडॉग मिलेनियर, न्‍यूयार्क, आई लव यू, द अमेजिंग स्‍पाईडर मेन, लाइफ ऑफ पाई, जुरासिक वर्ल्‍ड और इन्‍फर्नो आदि फिल्‍में कीं.

वापस इरफान की बीमारी पर. इरफान को हाई ग्रेड न्‍यूरो एंडोक्राइन ट्यूमर की बीमारी थी. मैंने स्‍वयं इस बीमारी से निकट साक्षात्‍कार किया है. यह बीमारी 2016 में मेरी पत्‍नी को हुई थी. उनका मार्च में देहावसान हो गया था. उस दौरान मैंने पत्‍नी के माध्‍यम से इस दर्दनाक और दुर्लभ बीमारी के बारे में जाना. एक तो ये रेयर है, बहुत तेजी से बढ़ती है. इस बारे में इरफान ने भी कहा था इसके इलाज के बारे में ज्‍यादा जानकारी नहीं है और इसके इलाज के बारे में संदेह है. मुंबई के केंसर के सबसे बड़े डॉक्‍टर ने साफ साफ कहा था कि अगर इलाज हो भी गया तो भी मरीज़ अधिकतम् चार साल जी सकता है, लेकिन बहुत, बहुत ज्‍यादा तकलीफ के साथ.

इरफान लाउड थिंकर थे. वे कहते हैं ‘में लिफ्ट में और सार्वजनिक स्‍थानों पर डॅायलाग बड़बड़ाने लगता था. जिससे साथ वाले बहुत असुविधा मेहसूस करते थे, खासकर बीवी सुतापा.’ इरफान घर से ये झूठ बोलकर एनएसडी गए थे कि मैं अभिनेता नहीं प्रोफेसर बनूंगा. एनएसडी में भी झूठ बोला कि उन्‍होंने खूब नाटक किए हैं. अच्‍छा किया उन्‍होंने झूठ बोला, अगर वो झूठ नहीं बोलते तो फिल्‍म इंडस्‍ट्री को इतना दिलकश सितारा कैसे मिलता ? मौत तो तय है और हरेक को जाना है, लेकिन तिरपन-चौपन साल की उम्र में मौत को असमय ही कहा जाएगा. सो ऊपर वाले से ये शिकायत हमेशा रहेगी कि फिल्‍म जगत से उसका नायाब तोहफा इतनी जल्‍दी क्‍यों छीन लिया गया?

(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)

ब्लॉगर के बारे में

शकील खानफिल्म और कला समीक्षक

फिल्म और कला समीक्षक तथा स्वतंत्र पत्रकार हैं. लेखक और निर्देशक हैं. एक फीचर फिल्म लिखी है. एक सीरियल सहित अनेक डाक्युमेंट्री और टेलीफिल्म्स लिखी और निर्देशित की हैं.

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