MATHURA: राधा रमण लाल जी मंदिर की रसोई में क्यों नहीं जलाई जाती माचिस, जानें एक रोचक इतिहास

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रिपोर्ट : चंदन सैनी

मथुरा. वृंदावन के कण-कण में श्रीकृष्ण और राधा का वास है. यही कारण है कि राधा-कृष्ण की अनेक लीलाएं वृंदावन में आपको देखने और सुनने को मिल जाएंगी. उन्हीं लीलाओं में से एक ऐसी लीला के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं, जिसे शायद ही आपने पहले कभी सुना होगा. वृंदावन के राधा रमण लाल जी मंदिर की रसोई में आज भी 500 वर्षों से लगातार अग्नि प्रज्वलित है. रसोई में माचिस का प्रवेश पूर्णतः वर्जित है. यह अग्नि कैसे जलाई गई और इसके पीछे क्या मान्यता है, वह हम आपको बता रहे हैं.

राधा रमण लाल जू के प्रकट करता और चैतन्य महाप्रभु के अनन्य शिष्य कहे जानेवाले गोपाल भट्ट गोस्वामी हैं. उन्होंने करीब 475 वर्ष पहले मंदिर में वैदिक मंत्रोच्चार से हवन की लकड़ियों को एक दूसरे के साथ घिसा, तो अग्नि प्रज्वलित हुई. उन्होंने ही हवन कुंड से निकली इस अग्नि को रसोई में प्रयोग करने की परंपरा शुरू की, जिसे मंदिर सेवायत और उनके वंशज बदस्तूर निभाते चले आ रहे हैं. यह अग्नि 477 साल बाद आज भी रसोई घर में प्रज्वलित है. इसी अग्नि से भगवान राधा रमण लाल जू का कच्चा प्रसाद तैयार होता है.

भगवान राधा रमण जू लाल मंदिर की पौराणिक मान्यता की अगर बात की जाए तो मंदिर आचार्य गोपाल भट्ट के वंशज वैष्णवाचार्य सुमित बताते हैं कि ठाकुर राधा रमण लाल का प्राकट्य पौने 500 साल पहले शालिग्राम शिला से हुआ. आचार्य गोपाल भट्ट चैतन्य महाप्रभु के अनन्य भक्त थे. आचार्य गोपाल भट्ट गोस्वामी की साधना व प्रेम के वशीभूत होकर वैशाख शुक्ल की पूर्णिमा की प्रभात बेला में प्रकट हुए.

राधा-रमण लाल मंदिर के सेवायत पुजारी सुमित ने बताया कि मंदिर में आज तक माचिस का प्रयोग नहीं हुआ है. मंदिर की परंपरा बेहद अनोखी है. उन्होंने बताया कि भगवान का जो प्रसाद रसोई घर में तैयार होता है, उस अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए माचिस का प्रयोग नहीं होता है. करीब 500 साल से लगातार अग्नि प्रज्वलित होती चली आ रही है.

Tags: Mathura news, UP news, Vrindavan



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