Navratri Special: सैकड़ों साल पुराने हैं माता के ये तीनों मंदिर, देवी की प्रतिमा खुद हुईं थी प्रकट…

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हाइलाइट्स

कानपुर के ये तीन मंदिर देश भर में प्रसिद्ध
सैकडों साल पुराने हैं माता के ये मंदिर
दर्शन के लिए दूर-दूर से आते हैं भक्त

कानपुर. उत्तर प्रदेश के कानपुर में कई मंदिर और मठ हैं. जिसमें कुछ तो इतने पुराने हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि लोगों की कई पीढ़ियां यहां पर पूजा करती रही हैं. कई सौ साल से यहां पर ये मंदिर स्थित हैं. सभी मंदिरों की अपनी आस्था, अपनी मान्यता है. चलिए आज आपको बताते हैं कानपुर के 3 प्रसिद्ध धामों के बारे में जहां पर पहुंचकर श्रद्धालुओं की हर मनोकामना पूरी होती है.

तपेश्वरी देवी धाम
कानपुर शहर से 6 किलोमीटर दूर स्थित है मां तपेश्वरी देवी धाम. इस मंदिर की मान्यता है कि मां सीता ने अपने दोनों सुपुत्र लव और कुश का मुंडन संस्कार इसी मंदिर के प्रांगण में करवाया था. साथ ही साथ मां सीता ने यहां पर रहकर कठोर तपस्या की थी. मां तपेश्वरी देवी धाम में मां की मूर्ति खुद प्रकट हुई हैं यानी यहां पर मां की मूर्ति स्वयंभू हैं. वैसे तो लोग साल भर दूर-दराज से बच्चों के मुंडन संस्कार के लिए यहां पहुंचते हैं, लेकिन नवरात्रि के मौके पर खास तौर पर जिनके बच्चों का मुंडन माना हुआ है वो तपेश्वरी देवी धाम पहुंचकर मुंडन संस्कार करवाते हैं. इनमें लड़का और लड़की दोनों के मुंडन यहां करवाए जाते हैं.

ताले वाली माता की महिमा
कानपुर शहर के बीचों-बीच स्थित बंगाली मोहल्ले में विराजती हैं काली माता. जिन्हें ताले वाली माता के नाम से भी जाना जाता है. कानपुर की संकरी गलियों से होते हुए काली माता का ये मंदिर कई सौ साल पुराना है. कहते हैं माता की मूर्ति यहां स्वयं प्रकट हुई थी. बाद में माता की मूर्ति के बगल मे कलकत्ते से लाई गई मिट्टी से मां काली की प्रतिमा तैयार की गई.

ताले वाली माता के नाम से भी जाना जाता है
हाथ में खड्ग-खप्पर, मुंड की माला पहने मां काली के दर्शन पूजन के लिए लोग दूर-दूर से इस मंदिर में पहुंचते हैं. मां काली के इस मंदिर को ताले वाली माता के नाम से भी जाना जाता है. कहा जाता है लोग अपनी मन्नत के साथ मां के दरबार में पहुंचते हैं और मन्नत मांग कर ताला मां के दरबार में लगा जाते हैं. जिसकी दो चाबियां होती हैं, एक चाबी भक्त मां के चरणों में समर्पित कर देते हैं और दूसरे ताले की चाबी अपने साथ घर लेकर जाते हैं. और जैसे ही भक्तों की मन्नतें पूरी होती है, वह दोबारा इस धाम में पहुंचकर ताला खोलते हैं और मां से आशीर्वाद लेते हैं. मां के प्रांगण में ऐसे हजारों ताले देखे जा सकते हैं. साथ ही यहां आने वाले लोग यह भी बताते हैं की मां के आंखों की नीर से असाध्य से असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं. लोगों का कहना है कि मां से जो भी मांगा, मां ने उसे पूरा किया. इसलिए लोगों की आस्था इस मंदिर पर बहुत ज्यादा है.

बारा देवी की यहां होती है पूजा
कानपुर के पुराने मंदिरों में से एक है बारा देवी धाम. कहते हैं जो भी यहां पहुंचता है 12 देवी के दर्शन जरूर करता है. बारा देवी का नाम बारा देवी इसलिए पड़ा क्योंकि यहां पर देवी अपनी 11 बहनों के साथ विराजती थी. यानी यह देवी का मायका था. कहते हैं कि एक बार पिता के भला-बुरा कहने से मां अपनी सारी बहनों के साथ जंगल की तरफ चली गईं, लेकिन बाद में जब लौटी तो सिर्फ सात बहने ही उनके साथ आईं बाकी बहनें दोबारा यहां नहीं लौटीं. अलग-अलग जगह पर चली गईं. इसे लेकर देवी के पिता को श्राप लगा और उनकी मृत्यु हो गई. आज भी इस मंदिर में सबसे पहले 12 देवी के मायके वालों की तरफ से पूजा की जाती है और इसके बाद ही आम श्रद्धालुओं के लिए कपाट खोले जाते हैं.

यहां पर आने वाले लोगों से जब हमने बात की तो उन्होंने बताया कि वो सालों से यहां पर आ रहे हैं. मां में उनकी बड़ी आस्था है. मां उनकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं. बारादेवी मंदिर के प्रांगण में नवरात्रि के मौके पर भव्य मेला लगता है, जो नवरात्रि की पहली पूजा से शुरू होकर पूर्णिमा पर खत्म होता है.

Tags: Kanpur news, Navratri, Uttarpradesh news



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