UP पंचायत चुनाव में भाजपा को हुआ नुकसान, सपा के अच्छे प्रदर्शन से नए सियासी संकेत | BJP poor performance in Uttar Pradesh Panchayat elections | – News in Hindi

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कोरोना लहर के चलते पूर्वांचल व मध्य यूपी में तो किसान आंदोलन की वजह से पश्चिमी यूपी में भाजपा को उम्मीद से विपरीत रिजल्ट देखने पड़े हैं. वाराणसी में भी उसे समाजवादी पार्टी ने पीछे छोड़ दिया है. काशी, मथुरा और अयोध्या में भी भाजपा को हार झेलनी पड़ी है.

Source: News18Hindi
Last updated on: May 5, 2021, 12:34 AM IST

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उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा है. कोरोना लहर के चलते पूर्वांचल व मध्य यूपी में तो किसान आंदोलन की वजह पश्चिमी यूपी में भाजपा को उम्मीद से विपरीत रिजल्ट देखने पड़े हैं. वाराणसी में भी उसे समाजवादी पार्टी ने पीछे छोड़ दिया है. काशी, मथुरा और अयोध्या में भी भाजपा को हार झेलनी पड़ी है. गोरखपुर, लखनऊ में भी भाजपा को चुनौती मिली है.

उत्तर प्रदेश में हुए जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव के ताजा परिणाम देखें तो भाजपा को अधिकांश सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा है. अब तक जिला पंचायत के 3050 सदस्यों में से 3047 के नतीजे या रुझान सामने आ चुके हैं. इनमें भाजपा ने 768, सपा ने 759 सीटें जीती हैं तो बसपा 369 सीटों पर जीत मिली है. कांग्रेस को 80 सीटें मिली हैं जबकि आम आदमी पार्टी भी वाराणसी सहित कई स्थानों पर जीत हासिल कर चुकी है. निर्दलीय प्रत्याशियों ने सबसे ज्यादा 1071 सीटों पर जीत हासिल की है.

अगले साल सूबे में विधानसभा चुनाव हैं जो 2024 का सेमीफाइनल माने जाएंगे और प्रतिष्ठा के नाम पर फिर वही जुमला सियासी फिजाओं में पैमाने पर होगा कि दिल्ली की गद्दी का रास्ता यूपी से होकर जाता है. ऐसे में ताजा नतीजे बेहद अहम हैं. ऐसे में भाजपा उत्तर प्रदेश को लेकर कोई रिस्क नहीं ले सकती. भले ही किसी को कुर्बान या अन्यत्र समायोजित करना पड़े.

जिला पंचायत के चुनाव परिणाम में जिले में बसपा ने पहला स्थान प्राप्त किया है और भाजपा और रालोद 9-9 सीट जीतकर के बराबर रहे हैं. जिले में 3 सीटों पर निर्दलीय एवं एक पर सपा ने परचम लहराया है. मथुरा में प्रदेश के पूर्व मंत्री एवं मांट क्षेत्र से विधायक श्यामसुंदर शर्मा की धर्मपत्नी एवं पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती सुधा शर्मा बसपा से चुनाव जीत गई हैं. वहीं पूर्व विधायक भाजपा प्रणतपाल सिंह के बेटे चुनाव हार गए हैं. पंचायत चुनाव में अयोध्या और काशी दोनों जगहों से आ रहे नतीजे भाजपा को परेशान करने वाले हैं.

कोरोना की दूसरी लहर के चरम पर पहुंचने की दशा में पंचायत चुनाव के आखिरी दो चरणों के जिलों में भाजपा को सबसे ज्यादा जनता का गुस्सा झेलना पड़ा है. परंपरागत रुप से भाजपा का गढ़ माने जाने वाले राजधानी लखनऊ में भी इसकी करारी हार हुई है. हालांकि बड़ी तादाद में जीते निर्दलीय जिला पंचायत चुनाव के सदस्यों को भाजपा अपने पाले का बता रही है. लेकिन वास्तविकता तो यही है कि पार्टी ने प्रदेश भर के सभी जिला पंचायत सदस्यों के पदों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए थे और सबसे ज्यादा व्यवस्थित तरीके से चुनाव लड़ा था.

उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों में कांग्रेस ने जिला पंचायत सदस्यों की 80 से ज्यादा सीटें जीती हैं. लंबे अरसे बाद दम खम से उतरी कांग्रेस में मायूसी जरुर है, पर बीते चुनावों के मुकाबले ये करीब दोगुनी हैं. इससे पहले 2016 में हुए पंचायत चुनावों में कांग्रेस ने 42 जिल पंचायत चुनावों की सीटें जीती थी. कांग्रेस को रायबरेली, प्रतापगढ़ और बहराइच में अच्छी सफलता मिली है. पंचायत चुनाव बेमन से लड़ी बसपा के लिए संतोषजनक यह है कि उसे इस बार कांग्रेस से पीछे नहीं जाना पड़ा है और कई जिलों में उसके इतने प्रत्याशी जीत गए हैं कि जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पाने में उसकी बड़ी भूमिका रहेगी.

भाजपा के लिए पश्चिम में किसान आंदोलन ने तो पूरब में कोरोना लहर ने खेल बिगाड़ने का काम किया है. कोरोना लहर के चरम पर होने की दशा में पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिन सीटों पर चुनाव हुए वहां भाजपा को तगड़ा नुकसान उठाना पड़ा है. कुशीनगर जिले की 61 जिला पंचायत सीट में मात्र 6 सीट भाजपा के खाते में आई हैं, जबकि 9 सीटों पर सपा व 3 पर बीएसपी का कब्जा हुआ और कांग्रेस ने भी तीन सीटें जीती हैं. करीब 40 सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशियों ने अपना लोहा मनवाया है.पंचायत चुनावों में कड़ी टक्कर देने वाली समाजवादी पार्टी के हौसले बढ़ गए हैं. सपा ने प्रदेश सरकार पर धांधली करने के आरोप भी लगाए हैं. पार्टी ने कहा है कि सपा समर्थित प्रत्याशियों को जीत के बाद भी सर्टिफिकेट ना देकर अधिकारी लोकतंत्र की गरिमा को तार तार कर रहे हैं. सपा ने राज्य निर्वाचन आयोग से पूरे मामले का संज्ञान लेने को कहा है.

पंचायत चुनावों के नतीजे विधान परिषद के स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्र की 36 सीटों के लिए भाजपा की रणनीति को बदलने को मजबूर कर सकते हैं. भाजपा की रणनीति पंचायत चुनावों के तुरंत बाद इन सीटों के चुनाव करा विधान परिषद में बहुमत पाने की थी. हालांकि, नतीजों के बाद उसके लिए अब यह कर पाना आसान न होगा. अब तक तो होता यही रहा है कि सत्ताधारी दल को विधान परिषद की इन 36 सीटों में अधिकांश आसानी से मिलती रही हैं. वर्तमान नतीजों को देखते हुए भाजपा से लिए विधान परिषद में बहुमत पाने की राह आसान नहीं होगी. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)


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First published: May 5, 2021, 12:34 AM IST



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