क्या ‘CJP’ को मिल पाएगा अपना चुनाव चिह्न? जानें चुनाव आयोग के कड़े नियम

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CJP : आजकल सोशल मीडिया के दौर में कब कौन सी चीज वायरल हो जाए और कब कोई नया ट्रेंड देश में बहस का मुद्दा बन जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। हाल ही में इंटरनेट पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (Cockroach Janta Party – CJP) नाम का एक संगठन तेजी से चर्चा में आया है। सोशल मीडिया पर तथाकथित रूप से इसे एक राजनीतिक दल के रूप में पेश किया जा रहा है, और इसके बैनर तले कुछ जगहों पर राजनीतिक पार्टियों की तरह विरोध-प्रदर्शन भी देखे गए हैं।

फिलहाल, CJP कोई रजिस्टर्ड राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि इसे एक व्यंग्यात्मक और विरोध जताने वाला ग्रुप (Satirical Protest Group) माना जा सकता है। इस ग्रुप ने ‘कॉकरोच’ को अपने प्रतीक के रूप में अपनाया है और भविष्य में एक राजनीतिक दल के रूप में चुनाव आयोग में रजिस्ट्रेशन कराने का दावा भी किया है।

ऐसे में हर किसी के मन में यह उत्सुकता है कि क्या भविष्य में ‘कॉकरोच’ को किसी पार्टी का आधिकारिक चुनाव चिह्न बनाया जा सकता है? भारत के कड़े चुनावी कानूनों और चुनाव आयोग (Election Commission) के नियमों को खंगालने पर इसका जो जवाब मिलता है, वह इस ग्रुप को निराश कर सकता है।

कैसे शुरू हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का पूरा विवाद?

इस अनोखी और अजीबोगरीब पार्टी के गठन के पीछे की कहानी भी काफी दिलचस्प है। दरअसल, यह पूरा मामला न्यायपालिका से जुड़े एक बयान के बाद शुरू हुआ। सुप्रीम कोर्ट के एक माननीय न्यायाधीश ने कानूनी क्षेत्र और न्यायपालिका में गलत तरीकों से प्रवेश करने वाले कुछ तत्वों पर टिप्पणी की थी। उन्होंने ऐसे लोगों की तुलना उन ‘कॉकरोच’ से की थी जो अपनी योग्यता से जगह नहीं बना पाते, तो अदालती प्रक्रियाओं और जजों के फैसलों पर बेबुनियाद उंगलियां उठाने लगते हैं।

इस बयान के आते ही सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गईं। बयान का विरोध करने वाले लोगों ने ‘कॉकरोच’ शब्द को पकड़ लिया और इसे इंटरनेट पर वायरल कर दिया। इसी विरोध और व्यंग्य के बीच ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का जन्म हुआ।

क्या कॉकरोच को मिल सकता है चुनाव चिह्न? जानिए क्या कहता है कानून

यदि कोई संगठन आगे चलकर खुद को एक राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत कराता है, तो वह चुनाव आयोग के सामने अपनी पसंद के प्रतीकों (Symbols) की सूची रख सकता है। लेकिन इसका यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि उसे मनपसंद सिंबल मिल ही जाएगा। इस मामले में अंतिम और सर्वोच्च निर्णय केवल चुनाव आयोग का होता है।

भारत में चुनाव चिह्नों के आवंटन को ‘इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968’ के तहत नियंत्रित किया जाता है। इस कानून के तहत चुनाव आयोग के पास ये नियम और अधिकार हैं:

1. फ्री सिंबल्स (Free Symbols) की खास लिस्ट

जो दल मान्यता प्राप्त (राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय) नहीं होते या जो निर्दलीय उम्मीदवार होते हैं, उन्हें चुनाव आयोग अपनी ‘फ्री सिंबल्स’ सूची से चिह्न आवंटित करता है। इस सूची में मुख्य रूप से रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली निर्जीव वस्तुएं जैसे- एयर कंडीशनर, फ्राइंग पैन, अलमारी, टूथब्रश, अंगूर या कटहल शामिल होते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि कम पढ़े-लिखे या निरक्षर मतदाता भी आसानी से बटन दबाकर अपने उम्मीदवार को चुन सकें।

2. जीव-जंतुओं के प्रतीकों पर पूरी तरह रोक

सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि चुनाव आयोग ने अब किसी भी नए पशु या पक्षी-आधारित चुनाव चिह्न के आवंटन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है। जानवरों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों की चिंताओं और चुनाव प्रचार के दौरान पशुओं के साथ होने वाली क्रूरता व उनके दुरुपयोग को देखते हुए यह कड़ा फैसला लिया गया है।

पहले तो मिलते थे जानवरों के सिंबल, फिर नियम क्यों बदले?

यह सच है कि भारत के चुनावी इतिहास में कई दलों को पशु-पक्षियों के सिंबल मिले हुए हैं।

  • पूर्व में कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिह्न ‘गाय और बछड़ा’ हुआ करता था।
  • दक्षिण भारत में एआईएडीएमके (AIADMDK) या अन्य क्षेत्रीय दलों के पास मुर्गा या अन्य जीव रहे हैं।
  • उत्तर प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी (BSP) के पास आज भी ‘हाथी’ का आरक्षित सिंबल है।

दरअसल, सालों पहले पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन के कार्यकाल के दौरान पशु क्रूरता के मामले उठाए गए थे। इसके बाद चुनाव आयोग ने अपने नियमों में व्यापक बदलाव किए। अब जिन पुरानी पार्टियों के पास पहले से जानवरों के सिंबल आरक्षित हैं, केवल उन्हीं के पास वे सुरक्षित रहेंगे। किसी भी नए संगठन को अब कोई नया पशु-पक्षी या कीट-पतंग आधारित सिंबल अलॉट नहीं किया जा सकता।

CJP की राजनीतिक पहचान पर क्यों है संकट?

चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, प्रस्तावित चुनाव चिह्न में निम्नलिखित कमियां नहीं होनी चाहिए:

  • वह पहले से किसी मान्यता प्राप्त दल के आरक्षित सिंबल से मिलता-जुलता न हो।
  • उसमें कोई धार्मिक, सांप्रदायिक या जातिसूचक एंगल न हो।
  • वह किसी भी प्रकार के जीवित पशु, पक्षी या कीट का प्रतिनिधित्व न करता हो।

इन सभी वैधानिक नियमों को देखते हुए यह साफ है कि यदि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ भविष्य में एक राजनीतिक दल के तौर पर रजिस्टर्ड हो भी जाती है, तो भी चुनाव आयोग द्वारा उसे ‘कॉकरोच’ का सिंबल मिलना नामुमकिन है। राजनीतिक दलों को देश के चुनावी कानूनों के दायरे में रहकर ही अपने प्रतीकों का चयन करना होता है।

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