क्या $90 के पार जाएगा कच्चा तेल? जानें भारत कब तक और कितना झेल सकता है महंगा क्रूड ऑयल

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कच्चा तेल

जी-7 शिखर सम्मेलन के बीच वैश्विक मंच से भारत के लिए एक बड़ी और महत्वपूर्ण खबर सामने आ रही है। एक तरफ जहाँ दुनिया भर के दिग्गज नेता वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर मंथन कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों को लेकर एक नई चुनौती खड़ी होती दिख रही है। वित्तीय बाजार की दिग्गज संस्था अवेंडस वेल्थ (Avendus Wealth) की एक होश उड़ाने वाली रिपोर्ट आई है, जो सीधे तौर पर देश की आर्थिक सेहत और आम आदमी की जेब से जुड़ी हुई है।

इस रिपोर्ट में भारत की ‘ऑयल प्राइस टॉलरेंस’ यानी कच्चा तेल झेलने की आखिरी सीमा का आकलन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कच्चे तेल की बर्दाश्त करने योग्य अधिकतम कीमत लगभग 90 डॉलर प्रति बैरल है। अगर इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल के दाम लंबे समय तक 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने रहते हैं, तो भारत की आर्थिक विकास दर (GDP Growth) पर इसका सीधा और बेहद नकारात्मक असर देखने को मिल सकता है।

क्या है भारत की तेल बर्दाश्त करने की क्षमता?

भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 से 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात (Import) करता है। यही वजह है कि वैश्विक बाजार में होने वाली मामूली हलचल भी भारतीय बाजारों में महंगाई बढ़ा देती है। अवेंडस वेल्थ की रिपोर्ट इस बात की ओर इशारा करती है कि 90 डॉलर तक की कीमत को भारत का घरेलू बाजार किसी तरह संभाल (Absorb) सकता है, लेकिन इसके ऊपर जाते ही जोखिम का मीटर रेड ज़ोन में आ जाएगा। इससे न सिर्फ देश का राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़ेगा, बल्कि रुपये की कीमत में भी गिरावट आ सकती है।

जी-7 शिखर सम्मेलन और भारत-यूरोपीय संघ की महाबैठक

इसी आर्थिक उठापटक और अशांत भू-राजनीतिक माहौल के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी-7 शिखर सम्मेलन के इतर एक बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक बैठक की है। पीएम मोदी ने यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन के साथ द्विपक्षीय बातचीत की।

इस बैठक में जनवरी 2026 में भारत में हुए ऐतिहासिक 16वें भारत-यूरोपीय संघ (India-EU) शिखर सम्मेलन के बाद से हुए समझौतों की प्रगति की समीक्षा की गई। इस मुलाकात की सबसे बड़ी उपलब्धि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ताओं का सफल समापन रहा। दोनों पक्षों ने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान वैश्विक हालातों को देखते हुए इस समझौते को जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए।

मजबूत सप्लाई चेन और वैश्विक स्थिरता पर फोकस

दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र और खुली बाजार अर्थव्यवस्था होने के नाते, भारत और यूरोपीय संघ का यह कदम चीन जैसे देशों पर निर्भरता कम करने और अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains) को सुरक्षित करने के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

नेताओं ने पश्चिम एशिया (West Asia) के हालिया घटनाक्रमों और वैश्विक शांति पर भी चर्चा की। एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि भारत-यूरोपीय संघ का यह व्यापारिक एजेंडा तेजी से आगे बढ़ता है, तो कच्चे तेल के संकट के बावजूद भारत को वैश्विक व्यापार में एक मजबूत बैकअप और नया बाजार मिलेगा, जो आने वाले समय में देश की ग्रोथ को मंदी से बचाने में मदद करेगा।

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